एक नास्तिक मित्र से संवाद
*एक नास्तिक मित्र से संवाद-*
नास्तिक मित्र- डॉक्टर साहब ! यहां कोई स्वामी पालक या रक्षक नहीं है, यहां ईश्वर या देवी देवता नाम की कोई चीज नहीं है, यह सब काल्पनिक मान्यताएं हैं ,आपको नहीं लगता कि इनके रहते सारे दुष्कर्म और पाप कर्म बढ़ रहे हैं,हिंसा हत्या महंगाई भ्रष्टाचार गरीबी बेईमानी भुखमरी शोषण अन्याय गरीबी सब कुछ बढ़ रहे हैं, इनके रहते तो इन सब को विचार करने के पश्चात यही निष्कर्ष निकलता है कि यहां ईश्वर नाम की कोई चीज नहीं है, हां ईश्वर एक फैंटास्टिक फेंटेसी है इसके अलावा कुछ भी नहीं इस दुनिया से परे कुछ भी नहीं जो कुछ है इस धरती पर ही है इस धरती के अलावा कहीं कुछ नहीं है।
उत्तर- नमस्ते जी, मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है फल भोगने में परतंत्र है। अच्छे बुरे कर्मों का फल इस जन्म में भी मिलता है और अगले जन्मों में भी। पिण्ड और ब्राह्मण्ड में जो इतनी सुन्दर रचना व व्यवस्था है वह सर्वव्यपाक चेतन सत्ता परमात्मा के बिना नहीं हो सकती। आपसे विनम्र निवेदन है कि एक बार कम से कम महर्षि दयानंद कृत सत्यार्थप्रकाश का सातवां आठवां अध्याय अवश्य पढ़िएगा।
नास्तिक मित्र- मैं मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारा नहीं जाता, मगर मेरे लिए, प्यार मोहब्बत, इंसान इंसाफ, इंसानियत भाईचारा,बराबरी आजादी, समता समानता, जनतंत्र गणतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद ही सबसे बड़ी इबादत हैं,मेरे लिए ये ही धर्म हैं,मैं इन सबका सबसे बड़ा पुजारी हूं। सृष्टि किसी बाह्य शक्ति द्वारा नहीं बनाई गई है, बल्कि यह भौतिकी के नियमों से बनी है वहीं इसके चालक हैं, इसका इसका सृष्टा कोई नहीं है। ना कोई भगवान खुदा अल्लाह ईश्वर गॉड और ना ही कोई देवी देवता।
उत्तर- ईश्वर सर्वव्यापी चेतन सत्ता है, मन्दिर मस्जिद चर्च गुरुद्वारा में जाने की आवश्यकता भी नहीं। चार मुंह वाले, चार आठ हाथ वाले, सूंड वाले देवी देवताओं व चमत्कारों को तो हम भी काल्पनिक ही मानते हैं। ईश्वर सब देवों का देव होने से महादेव हैं, चांद तारों से सजा आकाश उसके चमत्कार हैं। प्यार मुहब्बत इन्सानियत अच्छे दैवीय गुण हैं , सबको अपनाने चाहिए। हम आपसे पूछते हैं- सृष्टि को बनाने वाली शक्ति चेतन है या जड ? क्या बिना नियामक के नियम बन सकते हैं ? क्या बिना प्रबंधक के प्रबंध हो सकता है ? क्या व्यवस्थित निर्माण व नियमन बिना चेतन शक्ति के हो सकता है? क्या वेदादि शास्त्र व ऋषि मुनि झूठ बोलते हैं कि इस सृष्टि का कर्ता धर्ता हर्ता ईश्वर है और वह ईश्वर निराकार सच्चिदानन्द सर्वव्यपाक सर्वशक्तिमान सर्वश्रेष्ठ सर्वाधार सर्वेश्वर सर्वन्तर्यामी सर्वज्ञ हैं।
नास्तिक मित्र- आप ईश्वर ईश्वर करते हो उसकी सिद्धि कैसे करोगे ?
उत्तर- जैसे विज्ञान के क्षेत्र में वस्तुएँ प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द प्रमाणों से सिद्ध होती हैं ,वैसे ही ईश्वर भी तीनों प्रमाणों से सिद्ध होता है। परन्तु ईश्वर का प्रत्यक्ष नेत्रादि इन्द्रियों से नहीं होता, बल्कि मनादि अन्त: करण से होता है। ईश्वर की सिद्धि तीनों प्रमाणों से होती है-
(क) ईश्वर की सिद्धि में प्रत्यक्ष प्रमाण :प्रत्यक्ष दो प्रकार का होता है, एक बाह्य, दूसरा आन्तरिक । नेत्रादि इन्द्रियों से रूपादि विषय वाली वस्तुओं का जो प्रत्यक्ष होता है, वह बाह्य प्रत्यक्ष कहलाता है; और मन-बुद्धि आदि अन्त:करण से सुख-दु:ख, राग-द्वेष, भूख-प्यास आदि का जो प्रत्यक्ष होता है, वह आन्तरिक प्रत्यक्ष कहलाता है। जैसे रूपादि विषय वाली वस्तु को देखने के लिए नेत्रादि इन्द्रियों का स्वस्थ-स्वच्छ तथा कार्यकारी होना आवश्यक है, वैसे ही आत्मा परमात्मा को प्रत्यक्ष करने के लिए मन-बुद्धि आदि अन्तकरण का भी स्वस्थ तथा पवित्र होना अनिवार्य है। जैसे आंख में धूल गिर जाने पर या सूजन हो जाने पर या मोतियाबिन्द हो जाने पर वस्तु दिखाई नहीं देती, वैसे ही राग-द्वेषादि के कारण मन के अपवित्र हो जाने पर आत्मा-परमात्मा का प्रत्यक्ष नहीं होता, जैसे सुख-दु:खादि विषयों का प्रत्यक्ष नेत्रादि बाह्य इन्द्रियों से नहीं होता, केवल रूप-रसादि विषयों का ही होता है, वैसे ही आत्मा-परमात्मा, मन-बुद्धि आदि सूक्ष्म विषयों का प्रत्यक्ष भी नेत्रादि इन्द्रियों से नहीं होता, मन आदि अन्त:करण से होता है।
(ख) ईश्वर की सिद्धि में अनुमान प्रमाण- अनुमान प्रमाण से भी ईश्वर की सिद्धि होती है। कोई भी वस्तु यथा मकान, रेल, घड़ी आदि बिना बनाने वाले के नहीं बनती, चाहे हमने मकान, रेल, घड़ी आदि के बनाने वाले को अपनी आंखों से न भी देखा हो, तो भी उसके बनाने वाले की सत्ता को मानते हैं। । ठीक इसी प्रकार से वैज्ञानिक लोग इन पृथ्वी, सूर्यादि की उत्पत्ति करोड़ों वर्ष पुरानी मानते हैं।इससे भी सिद्ध है कि इनको बनाने वाला भी कोई न कोई अवश्य ही है। क्योंकि ये पृथ्वी, सूर्यादि जड़ पदार्थ अपने आप बन नहीं सकते, जैसे कि रेल आदि अपने आप नहीं बन सकते । और न सूर्यादि को मनुष्य लोग बना सकते हैं, क्योंकि मनुष्यों में इतना सामर्थ्य और ज्ञान नहीं है । इसलिए जो इन्हें बनाता है, वही ईश्वर है।
(ग) ईश्वर की सिद्धि शब्द प्रमाण से : जिन ऋषियों ने यम नियमादि योग के आठ अंगों का अनुष्ठान करके मन आदि अन्त:करण को एकाग्र व पवित्र बनाया, वे कहते हैं कि समाधि में आत्मा-परमात्मा का प्रत्यक्ष होता है । किन्तु यह प्रत्यक्ष नेत्रादि इन्द्रियों से होने वाले बाह्य प्रत्यक्ष के समान रंग रूप बाला न होकर, सुख-दुःखादि के समान आन्तरिक अनुभूति है । ऋषियों का यह अनुभव हमारे लिए शब्द प्रमाण है। मुण्डकोपनिषद ३.१.५ में ऋषि ने कहा है-
सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग् ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् ।
अन्त: शरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतय: क्षीणदोषा: ॥
अर्थात यह ईश्वर सदा सत्य आचरण से, तप से, यथार्थ ज्ञान से और ब्रह्मचर्य से प्राप्त किया जाता है । वह ज्ञानस्वरूप परमात्मा शरीर के भीतर ही विद्यमान है, योगी लोग रागद्वेष आदि दोषों को नष्ट करके समाधि में उसे अनुभव कर लेते हैं। पृथ्वी, सूर्य, आकाश-गंगाओं आदि के संबंध में वैज्ञानिकों के विवरण शब्द प्रमाण के रूप में स्वीकार किये जाते हैं तो ऋषि मुनियों के क्यों नहीं ? जैसे वैज्ञानिकों के विवरण शब्द प्रमाण हैं वैसे ऋषियों के ईश्वर सम्बन्धी विवरण भी शब्द प्रमाण हैं। शब्द प्रमाण में सबसे बड़ा प्रमाण तो ईश्वरीय वाणी वेद है-
येन द्यौरुग्रा पृथिवी च द्रढा येन स्व: स्तभितं येन नाक: ।
यो अन्तरिक्षे रजसो विमान: कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥
- यजुर्वेद- 32.6
भावार्थ - हे मनुष्यों ! मुझ सर्वव्यापक निराकार परमात्मा के द्वारा ही अन्तरिक्ष में स्थित सब सूर्य आदि नक्षत्रों व पृथिवी आदि ग्रहों उपग्रहों को धारण किया हुआ है, मुझ द्वारा ही मोक्ष आदि सब सुखों को धारण किया हुआ है, मैं ही सब लोक लोकान्तरों का निर्माता धारणकर्ता व व्यवस्थापक हूँ । सब मनुष्यों को चाहिये कि मुझ शुद्ध, प्रकाशस्वरूप, दिव्य सामर्थ्ययुक्त परमात्मा की योगाभ्यास व यज्ञादि शुभ कर्मों के द्वारा विशेष भक्ति किया करें।
इन प्रमाणों से ईश्वर की सत्ता सिद्ध है। आप कृपया उपर्युक्त तीनों प्रमाणों पर मनन चिंतन करें और शुद्ध अन्त:करण से आत्मा के द्वारा ईश्वर का आन्तरिक प्रत्यक्ष करने का प्रयास करें। यदि आपका यही आग्रह है की ईश्वर आंख से दिखना चाहिए तो मित्र! आंख से न दीखने वाली तो बहुत वस्तुएं हैं जैसे वायु, शब्द, गन्ध, सुख-दु:ख, मन-बुद्धि, भूख प्यास, दर्द ,पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति (Gravitational Force), विद्युत तरंगें (Electro-Magnatic Waves), अल्फा (Alpha), बीटा (Beta), गामा (Gamma), एक्स किरणें (X-Rays) आदि।
नास्तिक मित्र- तर्क व प्रमाण सहित ईश्वर की सत्ता को सिद्ध करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद ! आस्था व ईश्वर के नाम पर पण्डों मौलवियों पादरियों ने बहुत अन्धविश्वास पाखंड फैला रखा है जिस कारण मेरे जैसे लाखों लोगों का ईश्वर से विश्वास उठ गया है।
उत्तर- जी, आप सही कह रहे हैं। पशुबलि, पाषाणपूजा, शिवलिंग पूजा,गणेशपूजा, ग्रहपूजा, ग्रन्थ पूजा, महाकालपूजा, मूर्तिपूजा शनिपूजा, तीर्थ पूजा,अवतारवाद, प्राण-प्रतिष्ठा, केदारनाथ यात्रा, मानसरोवर यात्रा, अमरनाथ यात्रा, हज यात्रा....ये सब पाखंड इन्ही तथाकथित धर्म गुरुओं ने फैला रखें हैं। इनका ईश्वर वा ईश्वर भक्ति से कुछ लेना देना नहीं। वेद ईश्वर प्रदत्त संविधान हैं, उस संविधान का पालन करना सब मनुष्यों का परम धर्म है। वेद का उपदेश है- अहिंसा सत्य सयंम सदाचार का जीवन जीओ,सब जीवों से प्रेम करो, सौ वर्षों तक इमानदारी से कर्म करते हुए जीने की इच्छा करो। सुबह शाम ध्यान मुद्रा में बैठ कर परमात्मा के बेजोड़ उपकारों का चिन्तन करने से,,उसका धन्यवाद करने से, उसकी महिमा के गीत गाने से मन को बड़ी शांति मिलती है और परमात्मा के प्रति प्रेम व विश्वास में वृद्धि होती है। ईश्वर को न मानना, ईश्वर को ग़लत रुप में मानना, ईश्वर के नाम पर पाखंड फैलाना, वेद विरुद्ध आचरण करना नास्तिकता है। झूठ छल-कपट पाखंड घमंड में लिप्त नेता व बाबा लोग असली नास्तिक हैं,वामपंथी हैं, वाममार्गी हैं।
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*-डा मुमुक्षु आर्य*