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लव जिहाद

अलर्ट हो जाए लडकिया इसे विशेषकर ध्यान दे। और नीचे दिए गए कमेंट में डाली गई वीडियो अवश्य देखे। प्रश्नोत्तरी ( लव जिहाद विषय ) :- (1) प्रश्न :- लव जिहाद किसे कहते हैं ? उत्तर :- जब कोई मुसलमान पुरुष किसी गैर मुसलमान युवती को बहला फुसला कर उसके शील को भंग करके उससे शादी करके उसको ईस्लाम में दीक्षित कर लेता है । इसी को लव जिहाद कहा जाता है । (2) प्रश्न :- लव जिहाद क्यों किया जाता है ? उत्तर :- ताकि गैर मुसलमानों का शीघ्रता से ईस्लामीकरण हो । क्योंकिं जैसे किसी भी जाती को समाप्त करना हो तो उनकी स्त्रीयों को दूषित किया जाता है । जिससे कि वो अपने समाज में आत्म सम्मान खो दें और दूसरे समाज में जाने को बाध्य हो सकें । जिससे कि मुसलमान उस लड़की की सम्पत्ति का मालिक बने और उस लड़की के घर वाले सिर उठा कर नहीं जी सकें। लव जिहाद का मुख्य उद्देश्य है अल तकियाह, ( गज़्वा ए हिन्द ) यानी कि भारत का ईस्लामीकरण । (3) प्रश्न :- लव जिहाद से ईस्लामीकरण कैसे होता है ? उत्तर :- क्योंकि लव जिहाद की शिकार युवती को उसका हिन्दू समाज अपनाने को तैय्यार नहीं होता है । और जिसके कारण उसके पास और कोई मार्ग शेष नहीं रहता तो...

वेद उपनिषद दर्शन में अंतर व उनका आध्यात्मिक संदेश

उपनिषदों व दर्शनों में अन्तर व आध्यात्मिक संदेश- सृष्टि बनाने का प्रयोजन था कि मनुष्य किए हुए कर्मों का फल भोगे और आगामी निष्काम कर्म करता हुआ मोक्ष प्राप्त करें | सृष्टि को बनाने के पश्चात ईश्वर ने हमारे सामने एक विधान दिया कि सृष्टि का उपयोग कैसे करें जिसको वेद कहते हैं , ऋषियों ने चारों वेदो की विद्या सीखी फिर अलग-अलग ग्रंथ बनाए जैसे व्याकरण का, दर्शन का, पाक विद्या का, चिकित्सा विद्या का, अध्यात्म विद्या का | दर्शन शास्त्रों व उपनिषदों में अध्यात्म विद्या है|  इनमें अंतर यह है कि दर्शनशास्त्र में अध्यात्म विद्या को तर्क से समझाया गया है,  दर्शन शास्त्रों में, ईश्वर है या नहीं है , है तो एक है या बहुत सारे हैं, आत्मा है या नहीं है, है तो एक है या बहुत सारे हैं, आत्मा ईश्वर का अंश है या अलग चीज है, कर्म फल क्या है, बंधन क्या है, मुक्ति क्या है , समाधि क्या है, उसके उपाय क्या है, यह सारी बातें तर्क प्रधान ढंग से बाल की खाल उतार के समझाया गया है | उपनिषदों में इन्हीं बातों को श्रद्धा से बताया गया है, इनमें तर्क की प्रमुखता नहीं, तर्क बहुत थोड़ा है, श्रद्धा प्रमुख है| सबसे पहला...

वृक्षादि में जीवात्मा- भाग एक

*वृक्षादि में जीवात्मा ?? भाग एक-* - डा मुमुक्षु आर्य  प्रकृति में कुछ सजीव कुछ निर्जीव चीजें हैं। जिनमे जीव है वह सजीव जिनमे जीव नही है वह निर्जीव। अक्सर जिनमे जीवन है वह सजीव हैं उन में जीवात्मा भी है। लेकिन सभी में ऐसा हो ये जरूरी नहीं। तो प्रश्न उठते हैं-  क्या बिना जीवात्मा के जीवन संभव है ? क्या वृृृृक्षों में आत्मा है ? क्या अमीबा जैसे एक कोशिकीय जीवों में आत्मा है ?क्यों कि अमीबा काटने पर भी कई हिस्सों में जीवित रहता है ? क्या सिर धड पूंछ वाले शुक्राणुओं में आत्मा है ? 1) बिना आत्मा के जीवन संभव है या नहीं?  तो उत्तर है - हाँ संभव है। जैसे जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो आत्मा तो तुरंत शरीर से अलग हो जाती है परंतु व्यक्ति के कुछ अंग जैसे आँखे, ह्रदय, किडनी आदि फिर भी कुछ समय के लिए जीवित रहते हैं। तभी तो आँखों को दान करके दूसरे व्यक्तियो में लगाया जा सकता है। तो यहाँ स्पष्ट होता है कि जीवन अलग है , आत्मा अलग। बिना आत्मा के भी जीवन संभव है ।परंतु मनुष्य आदि प्राणियों में  यह कुछ ही समय के लिए होता है। यदि आत्मा का संयोग हो तो जीवन काल भी बढ़ जाता है।...

स्वर विज्ञान

•••स्वरों पर प्रकाश••• √•पहले तो हमें यह जानना चाहिए कि ‘स्वर’ शब्द के कई अर्थ होते हैं । इनमें से कुछ इस प्रकार हैं – √•अच् – वर्णमाला में जो स्वर (vowels) होते हैं – अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ । इनसे अन्य सभी वर्ण हल् या व्यञ्जन (consonants) कहाते हैं । स्वर ऐसा क्यों कहाते हैं, इसका निर्वचन पतञ्जलि ने महाभाष्य में दिया है – "स्वयं राजन्त इति स्वराः" (महाभाष्य १।२।२९) – अर्थात् “जिनके उच्चारण में दूसरे वर्णों के सहाय की अपेक्षा न हो” । इस वाक्य को पूर्णतया समझने के लिए, स्वरों के विपरीत, व्यञ्जनों की परिभाषा को भी समझना पड़ेगा – "अन्वग्भवति व्यञ्जनमिति" (महाभाष्य १।२।२९) – अर्थात् “जिनका उच्चारण बिना स्वर के नहीं हो सकता, वे व्यञ्जन कहाते हैं”। सो, यदि आप ‘क्’ बोलना चाहें, तो आप पाएंगे कि उसको बोलना सम्भव नहीं है; परन्तु यदि हम उसके आगे या पीछे या कुछ व्यञ्जनों के व्यवधान से, पूर्व या पश्चात्, एक स्वर लगा दें, तो झट से उनको बोल पाएंगे, जैसे – इक्, कि, क्यों, उदञ्च् । इसके विपरीत स्वरों को आप अकेले ही बोल सकते हैं – आओ । यहां तक तो सब समझते हैं, अब विशेष बात समझत...

कैलाश पति शिवजी ओम् व गायत्री के उपासक थे।

शिवजी परम योगी और परम ईश्वरभक्त थे। वे एक निराकार ईश्वर *'ओ३म्'* की उपासना करते थे। वह *ओ३म्* का जाप करते थे और परमात्मा की प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ साधन *गायत्री-मन्त्र* को बताते थे। वेद, उपनिषद और अन्य धार्मिक ग्रन्थों में भी *गायत्री-मन्त्र* की महिमा का बखान किया गया है। परम योगी ईश्वरभक्त शिवजी ने स्वयं गायत्री की महिमा का बखान किया है: एक बार कैलाश पर्वत पर विराजमान महादेव शिव से पार्वती जी ने प्रश्न किया कि हे योगेश्वर ! आप किस योग की उपासना करते हैं, जिससे आप परम सिद्धि को प्राप्त हुए हैं? शिवजी ने कहा― *गायत्री वेदमातास्ति साऽऽद्या शक्तिर्मता भुवि ।* *जगतां जननी चैव तामुपासेऽहमेव हि ।।* भावार्थ- गायत्री वेदमाता है। पृथ्वी पर वह आद्या शक्ति कहलाती है। वही संसार की माता है। मैं उसी की उपासना करता हूँ। *यौगिकानां समस्तानां साधनानां तु हे प्रिये !* *गायत्र्येव मता लोके मूलाधारा विदांवरै: ।।* भावार्थ―हे प्रिये ! विद्वानों ने समस्त यौगिक साधनाओं की मूलाधार गायत्री ही को माना है। *भूलोकस्यास्य गायत्री कामधेनुर्मता बुधै: ।* *लोक आश्रयणेनामुं सर्वमेवाधिगच्छति ।।* भावार्थ―विद्वानो...

अपने पिता के चित्र पर थूक कर दिखाओ- विवेकानंद

कुछ लोगों ने मूर्ति पूजा को सही साबित करने के लियें स्वामी विवेकानंद के नाम से एक कहानी गढ रखी है जिसमें विवेकानंद एक राजा को कहते हैं कि अगर मूर्ति पूजा गलत है तो अपने पिता की फोटो पर थूक कर दिखाओ, आओ इस कहानी की समीक्षा करते हैं-  कोई सधारण व्यक्ति भी  कहीं थूकने से पहले सोचेगा कि यहाँ थूकना उचित है भी या नहीं।  विवेकानंद जी का ये कहना कि पिता के चित्र पर थूकें यह कोई समझदारी वाला तर्क नहीं । स्वामी विवेकानन्द ने राजा से जिस तस्वीर पर धूकने की बात की वह उनके पिता की थी और वे साकार थे। इसलिए उनकी मूर्ति तो बन सकती है किन्तु ईश्वर तो निराकार है उनकी मूर्ति कैसे बन सकती है ? पिता या महापुरषों की तस्वीर घर पर लगानी चाहिये और उनसे प्रेरणा भी लेना चाहिए किन्तु उस तस्वीर  को जो जड़ है उसे भोजन करवाना, उसकी आरती उतारना, उसमें प्राणप्रतिष्ठा करना तो मूर्खता ही होगी यदि उस चित्र को  ईश्वर की जगह पूजेंगे तो ईश्वर का अपमान भी होगा । ईश्वर की भांति भांति की मूर्तियां बना कर पूजना हमारे किसी धर्म शास्त्र में नहीं । मूर्ति पूजा ईश्वर प्राप्ति का साधन नहीं है अपितु बाधक है । न...

आर्यसमाज भवनों में गुरुकुल

आर्य समाज भवनों में गुरुकुल - डॉ.मुमुक्षु आर्य आर्य समाज भवनों में 10, 20, 50, 100 विद्यार्थियों का गुरुकुल होना चाहिए, हमें आर्य समाज नोएडा का प्रधान बनने का अवसर मिला तो हमने वहाँ सौ विद्यार्थियों का गुरुकुल खोल कर सम्पूर्ण आर्य जगत के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। आर्य समाज भवनों के सदुपयोग करने और वर्तमान स्थिति को सुधारने का यह सर्वोत्तम उपाय है हमारी प्रेरणा से आर्य समाज दयानंद विहार दिल्ली, आर्य समाज पहाड़ गंज दिल्ली,आर्य समाज संदेश विहार दिल्ली व कुछ अन्य आर्य समाजों में भी गुरुकुल स्थापित हो चुके हैं। आर्य समाज भवनों में गुरुकुलों का संचालन करना बहुत सरल है क्योंकि भवन आपके पास है, यज्ञशाला आपके पास है, पुस्तकालय आपके पास है, कमेटी आपके पास है, धन आपके पास है, धन न भी हो तो गुरुकुलों के नाम पर जनता से अच्छा सहयोग मिल जाता है। वेद का पढ़ना सब आर्यों का परमधर्म है, ये गुरुकुल ही हैं जिनके माध्यम से इस धर्म को निभाया जा सकता है। सप्ताह में एक बार सत्संग कर लेने व साल में एक बार वार्षिकोत्सव कर लेने से वेद का प्रचार प्रसार नहीं हो सकताl सभी सम्पन्न सज्जनों को गुरुकुलों का तन म...