वेद उपनिषद दर्शन में अंतर व उनका आध्यात्मिक संदेश

उपनिषदों व दर्शनों में अन्तर व आध्यात्मिक संदेश-

सृष्टि बनाने का प्रयोजन था कि मनुष्य किए हुए कर्मों का फल भोगे और आगामी निष्काम कर्म करता हुआ मोक्ष प्राप्त करें | सृष्टि को बनाने के पश्चात ईश्वर ने हमारे सामने एक विधान दिया कि सृष्टि का उपयोग कैसे करें जिसको वेद कहते हैं , ऋषियों ने चारों वेदो की विद्या सीखी फिर अलग-अलग ग्रंथ बनाए जैसे व्याकरण का, दर्शन का, पाक विद्या का, चिकित्सा विद्या का, अध्यात्म विद्या का |

दर्शन शास्त्रों व उपनिषदों में अध्यात्म विद्या है|  इनमें अंतर यह है कि दर्शनशास्त्र में अध्यात्म विद्या को तर्क से समझाया गया है,  दर्शन शास्त्रों में, ईश्वर है या नहीं है , है तो एक है या बहुत सारे हैं, आत्मा है या नहीं है, है तो एक है या बहुत सारे हैं, आत्मा ईश्वर का अंश है या अलग चीज है, कर्म फल क्या है, बंधन क्या है, मुक्ति क्या है , समाधि क्या है, उसके उपाय क्या है, यह सारी बातें तर्क प्रधान ढंग से बाल की खाल उतार के समझाया गया है | उपनिषदों में इन्हीं बातों को श्रद्धा से बताया गया है, इनमें तर्क की प्रमुखता नहीं, तर्क बहुत थोड़ा है, श्रद्धा प्रमुख है|

सबसे पहला उपनिषद इशोपनिषद है और यह इशोपनिषद यजुर्वेद का चालीसवाँ  अध्याय हैं| सभी ग्यारह उपनिषद  वेदों पर ही आधारित हैं, वेदों के ही सिद्धांत को ऋषियों ने अपनी भाषा में लिख दिया | इनको पढ़ने के उपरांत जो शंका खड़ी हुई उनका समाधान करने के लिए वेदांत विद्या है | वेदांत दर्शन का उपनिषदों के साथ सीधा सम्बंध है| 

इसी प्रकार जब वैदिक साहित्य को पढ़ते है तो उसमें कुछ कर्मकांड की बातें भी हैं , कर्मकांड की जो समस्याएं हैं उनके समाधान के लिए मीमांसा दर्शन है जैमिनी मुनि का |  वेदांत और मीमांसा दोनों समस्याओं को सुलझाते हैं , अत: इन दोनों का नाम मीमांसा है , एक का नाम पूर्व मीमांसा तो दूसरे का उत्तर मीमांसा | जो जैमिनी कृत है वह पूर्व मीमांसा है उसको वाक्य विज्ञान भी कहते हैं, जो कर्मकांड की समस्या को सुलझाता है |  उसमें बताया गया कि वाक्य के कितने अर्थ होते हैं ? उसमें करीब-करीब एक हजार नियम बताए हैं कि इस कानून से ये अर्थ होगा इस कानून से ऐसा अर्थ होगा तो वह भाषा विज्ञान व वाक्य विज्ञान का विषय है|  पूर्व मीमांसा कर्मकांड की समस्या को सुलझाता है तो उत्तर मीमांसा अध्यात्म के वाक्यों की समस्या को सुलझाता है | 

कुछ लोग वेदांत का नाम लेकर अद्वैतवाद सिखाते हैं , इन्होंने "ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या" दुनिया भर में  यह भ्रांति फैला रखी है कि उपनिषद और वेदांत तो अद्वैतवाद का समर्थन करते हैं! शंकराचार्य ने इस सिद्धांत का प्रचार शुरू किया जो मूल रूप से उनके दादा गुरु का सिद्धांत था जिसका नाम था गौड़पादाचार्य| शंकराचार्य जी ने अद्वैत मत की  स्थापना की अर्थात ना जीव है, ना प्रकृति, दोनों में कुछ नहीं , केवल ब्रह्म है | यह उस समय उन्होंने प्रचार किया जब जैनियों का प्रभाव बहुत ज्यादा था, जैन लोग ब्रह्म को मानते नहीं , केवल जीव और प्रकृति को ही मानते हैं | परन्तु वेद कहता है कि ब्रह्म जीव प्रकृति तीनों अनादि तत्व है , दोनों में शास्त्रार्थ हुआ, शास्त्रार्थ में जैनियों की पराजय हुई | ईश्वर, जीव व प्रकृति इन तीनों को अनादि मानना ही वैदिक त्रैतवाद है | इशोपनिषद के पहले ही मंत्र में त्रैतवाद की स्थापना है-

"ईशावास्यम इदं सर्वं यत किंचित जगत्याम जगत तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्य स्वितधनं"   

अर्थात प्रकृति से लेकर पृथ्वी पर्यन्त सब पदार्थ ईश्वर में व्याप्त है , ईश्वर सब पदार्थों का असली मालिक है, हम जीव इस सृष्टि का त्याग पूर्वक भोग करें | अर्थात ईशोपनिषद ईश्वर, जीव और प्रकृति की पृथक पृथक सत्ता का उपदेश देता है | सांख्य दर्शन में भी ऐसा ही वर्णन मिलता है-  प्रकृति से महतत्व बना, महतत्व से अहंकार , अहंकार से मन इंद्रियां तनमात्राएं , तनमात्राओं से पंचमहाभूत| इन पंचमहाभूत का निर्माण ईश्वर ही करता है और इसका उपभोक्ता जीव है |

ईशोपनिषद के इस प्रधम मंत्र के अनुसार प्रकृति से लेकर पृथ्वी तक जो भी कुछ चर-अचर है सब में ईश्वर समाहित है| सारा जगत ईश्वर ने बनाया है, ईश्वर इसका मालिक है | मालिक की आज्ञा है  " तेन त्यक्तेन भुंजीथा"   अर्थास सृष्टि को त्याग पूर्वक भोगो, आसक्त होकर नही | आसक्ति होगी तो एक सुख लोगे तो योगदर्शन के अनुसार चार प्रकार के दु:ख साथ में भोगने पडेंगे। आगे कहा " मा गृधः " लालच मत कर| अब लोभ क्यों न करें ? क्योंकि "कस्य स्वितधनं " किसका है यह धन? कौन इसको साथ ले गया ? आज तक संसार में कोई भी भौतिक वस्तु साथ ले कर के नहीं गया, सब यहीं छोड़ कर जाना है, इसलिए त्याग पूर्वक सेवन करो, निष्काम कर्म करो और मोक्ष प्राप्त करो ।

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