अपने पिता के चित्र पर थूक कर दिखाओ- विवेकानंद

कुछ लोगों ने मूर्ति पूजा को सही साबित करने के लियें स्वामी विवेकानंद के नाम से एक कहानी गढ रखी है जिसमें विवेकानंद एक राजा को कहते हैं कि अगर मूर्ति पूजा गलत है तो अपने पिता की फोटो पर थूक कर दिखाओ, आओ इस कहानी की समीक्षा करते हैं- 

कोई सधारण व्यक्ति भी  कहीं थूकने से पहले सोचेगा कि यहाँ थूकना उचित है भी या नहीं।  विवेकानंद जी का ये कहना कि पिता के चित्र पर थूकें यह कोई समझदारी वाला तर्क नहीं । स्वामी विवेकानन्द ने राजा से जिस तस्वीर पर धूकने की बात की वह उनके पिता की थी और वे साकार थे। इसलिए उनकी मूर्ति तो बन सकती है किन्तु ईश्वर तो निराकार है उनकी मूर्ति कैसे बन सकती है ? पिता या महापुरषों की तस्वीर घर पर लगानी चाहिये और उनसे प्रेरणा भी लेना चाहिए किन्तु उस तस्वीर  को जो जड़ है उसे भोजन करवाना, उसकी आरती उतारना, उसमें प्राणप्रतिष्ठा करना तो मूर्खता ही होगी

यदि उस चित्र को  ईश्वर की जगह पूजेंगे तो ईश्वर का अपमान भी होगा । ईश्वर की भांति भांति की मूर्तियां बना कर पूजना हमारे किसी धर्म शास्त्र में नहीं । मूर्ति पूजा ईश्वर प्राप्ति का साधन नहीं है अपितु बाधक है । निरन्तर योगाभ्यास व वेदानुकूल आचरण ही ईश्वर प्राप्ति का एकमात्र उपाय है ।

वेदादि आर्ष ग्रन्थों में मूर्ति पूजा का कोई विधान नहीं है | वेद तो घोषणापूर्ण कहते हैं- 

न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः( यजुर्वेद ३२ -३) अर्थात जिसका नाम महान यश वाला है उस परमात्मा की कोई मूर्ति , तुलना , प्रतिकृति , प्रतिनिधि नहीं है । 

यजुर्वेद 40.08 में भी परमात्मा ने स्वयं को सर्वथा निराकार, सर्वव्यापक, अजन्मा, रंगरुप रहित व नसनाडियों के बंधन में न आने वाला कहा है । 

स्मरण रहे विवेकानंद जी तो मांस भी खाते थे, सिगार भी पीते थे, काली मां को प्रसन्न करने के लिये बकरों की बलि भी देते थे और इस्लाम ईसाईयत के प्रशंसक भी थे । शिकागो में उन्होंने अपने भाषण में सभी धर्मों को ईश्वर प्राप्ति का मार्ग बताया था उनके व्यक्तव्य विरोधाभासों से भरे पड़े हैं ।

सब धर्मों का मूल वेद है, वेदानूकुल आचरण ही धर्म है | अहिंसा सत्य अस्तेय संयम सदाचार आदि शुभ गुणों को धारण करना धर्म है| मनुस्मृति मे धर्म के दश लक्षणों में यही सब बताया गया है| हिन्दू मुस्लिम सिक्ख जैन बौद्ध ईसाई धर्म नहीं धंधा है|

 हिन्दू कोई धर्म नहीं, एक खिचडीनुमा जीवनशैली है जिसमें आस्तिक नास्तिक, मांसाहारी शाकाहारी, शराबी कबाबी सब आते है| धर्म एक ही है- वैदिक अर्थात वेदानूकुल आचरण | ईश्वर एक है जिसे वेद में सर्वव्यापी निराकार अजन्मा अनन्त बताया है, वह अवतार नहीं लेता, न ही उसे अवतार लेने की आवश्यकता है|  कथित हिन्दू धर्म अन्धविश्वास पाखंड अवतारवाद पर खड़ा है| यही उसके पतन व पराधीनता का मुख्य कारण है|

राम कण कण में रमे हुए हैं, तुम्हारे अंदर बाहर सर्वत्र सदा से विद्यमान हैं,| उसे तुम्हारे आलीशान मंदिरों से कुछ लेना देना नहीं | राम की मूर्तियां बना कर उनमें प्राणप्रतिष्ठा का नाटक करना जनता को मूर्ख बनाना है | दशरथ पुत्र राम की पूजा करनी है तो उनकी तरह नित्य परमात्मा का ध्यान करो, ओम् का जप करो, यज्ञ करो, मां बाप की सेवा करो, सयंय सदाचार का जीवन जीओ, झूठ छल कपट से दूर रहो, शुद्ध सात्विक भोजन करो, मांस अंडा बीड़ी सिगरेट शराब का परित्याग करोकरो| जय श्री राम के नारे लगा कर हुडदंग करने वाले, गाली गलौज करने वाले व झूठ छल कपट की राजनीति करने वाले राम भक्त नहीं हो सकते |
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- डा मुमुक्षु आर्य

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