कैलाश पति शिवजी ओम् व गायत्री के उपासक थे।
शिवजी परम योगी और परम ईश्वरभक्त थे। वे एक निराकार ईश्वर *'ओ३म्'* की उपासना करते थे। वह *ओ३म्* का जाप करते थे और परमात्मा की प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ साधन *गायत्री-मन्त्र* को बताते थे। वेद, उपनिषद और अन्य धार्मिक ग्रन्थों में भी *गायत्री-मन्त्र* की महिमा का बखान किया गया है। परम योगी ईश्वरभक्त शिवजी ने स्वयं गायत्री की महिमा का बखान किया है: एक बार कैलाश पर्वत पर विराजमान महादेव शिव से पार्वती जी ने प्रश्न किया कि हे योगेश्वर ! आप किस योग की उपासना करते हैं, जिससे आप परम सिद्धि को प्राप्त हुए हैं? शिवजी ने कहा―
*गायत्री वेदमातास्ति साऽऽद्या शक्तिर्मता भुवि ।*
*जगतां जननी चैव तामुपासेऽहमेव हि ।।*
भावार्थ- गायत्री वेदमाता है। पृथ्वी पर वह आद्या शक्ति कहलाती है। वही संसार की माता है। मैं उसी की उपासना करता हूँ।
*यौगिकानां समस्तानां साधनानां तु हे प्रिये !*
*गायत्र्येव मता लोके मूलाधारा विदांवरै: ।।*
भावार्थ―हे प्रिये ! विद्वानों ने समस्त यौगिक साधनाओं की मूलाधार गायत्री ही को माना है।
*भूलोकस्यास्य गायत्री कामधेनुर्मता बुधै: ।*
*लोक आश्रयणेनामुं सर्वमेवाधिगच्छति ।।*
भावार्थ―विद्वानों ने गायत्री को भूलोक की कामधेनु माना है। संसार इस का आश्रय लेकर सब कुछ प्राप्त कर सकता है।
*कलौ युगे मनुष्याणां शरीराणीति पार्वती ।*
*पृथ्वीतत्त्वप्रधानानि जानास्येव भवन्ति हि ।।*
भावार्थ―हे पार्वति, कलियुग में मनुष्यों के शरीर पृथ्वी तत्त्व प्रधान होते हैं, यह तो तुम जानती ही हो।
*सूक्ष्मतत्त्वप्रधानान्य–युगोद्भूत–नृणामत: ।*
*सिद्धीनां तपसामेते न भवन्त्यधिकारिण: ।।*
भावार्थ―इसलिए अन्य युगों में उत्पन्न हुए सूक्ष्मतत्त्व–प्रधान मनुष्यों की सिद्धि और तप के ये अधिकारी नहीं होते।
*पञ्चाङ्गयोगसंसिद्ध्या गायत्र्यास्तु तथापि ते ।*
*तद्युगानां सर्वश्रेष्ठां सिद्धिं सम्प्राप्नुवन्ति हि ।।*
भावार्थ―फिर भी वे गायत्री पंचांग की सिद्धि द्वारा उन युगों की सर्वश्रेष्ठ सिद्धियां प्राप्त कर सकते हैं।
*गायत्र्येव तपो योग: साधनं ध्यानमुच्यते ।*
*सिद्धीनां सा मता माता नात: किञ्चिद् बृहत्तरम् ।।*
भावार्थ―गायत्री तप है, योग है, साधन है और वह ही सिद्धियों की माता मानी है। इस गायत्री से बढ़कर अन्य कोई वस्तु नहीं।
भगवान शंकर ने अपने मुखारविन्द से गायत्री उपासना के इतने गुण गायन किये हैं, और स्वयं भी उसी गायत्री की उपासना करने का रहस्य बतलाते हैं।
अत: अब तो स्पष्ट है गया कि योगीराज शिवजी भी गायत्री मन्त्र द्वारा उसी निराकार, अजन्मा, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् ईश्वर का ध्यान करते थे। वे परम ईश्वर भक्त थे। शिवजी शरीरधारी थे और शरीरधारी कभी ईश्वर नहीं हो सकता। क्योंकि शरीरधारी जन्म-मरण, सुख-दु:ख, हानि-लाभ, भूख-प्यास आदि से बच नहीं सकता। शरीरधारी अर्थात् साकार, सर्वव्यापक भी नहीं हो सकता। एक ही जगह रहेगा, सम्पूर्ण सृष्टि को शरीरधारी नहीं चला सकता, क्योंकि शरीरधारी एक ही स्थान पर रह सकता है अर्थात् एकदेशी होगा और एकदेशी होने से अल्प शक्ति वाला होगा। हे शिवजी के भक्तों! उस ईश्वर *ओ३म्* की उपासना करो, जिस ईश्वर के ध्यान में शिवजी महाराज भी बैठे रहते थे।