आर्य समाज मन्दिरों में गुरुकुल
आर्य समाज भवनों में गुरुकुल
- डॉ.मुमुक्षु आर्य
आर्य समाज भवनों में 10, 20, 50, 100 विद्यार्थियों का गुरुकुल होना चाहिए, हमें आर्य समाज नोएडा का प्रधान बनने का अवसर मिला तो हमने वहाँ सौ विद्यार्थियों का गुरुकुल खोल कर सम्पूर्ण आर्य जगत के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। आर्य समाज भवनों के सदुपयोग करने और वर्तमान स्थिति को सुधारने का यह सर्वोत्तम उपाय है हमारी प्रेरणा से आर्य समाज दयानंद विहार दिल्ली, आर्य समाज पहाड़ गंज दिल्ली,आर्य समाज संदेश विहार दिल्ली व कुछ अन्य आर्य समाजों में भी गुरुकुल स्थापित हो चुके हैं।
आर्य समाज भवनों में गुरुकुलों का संचालन करना बहुत सरल है क्योंकि भवन आपके पास है, यज्ञशाला आपके पास है, पुस्तकालय आपके पास है, कमेटी आपके पास है, धन आपके पास है, धन न भी हो तो गुरुकुलों के नाम पर जनता से अच्छा सहयोग मिल जाता है। वेद का पढ़ना सब आर्यों का परमधर्म है, ये गुरुकुल ही हैं जिनके माध्यम से इस धर्म को निभाया जा सकता है। सप्ताह में एक बार सत्संग कर लेने व साल में एक बार वार्षिकोत्सव कर लेने से वेद का प्रचार प्रसार नहीं हो सकताl सभी सम्पन्न सज्जनों को गुरुकुलों का तन मन धन से सहयोग करना चाहिए, आप अपने बच्चों के लिए करोड़ों छोड़ जाते हैं परन्तु गुरुकुलों के लिए कुछ लाख वा कुछ हजार रुपयों का सहयोग करने को भी तत्पर नहीं!! भारत को विश्व गुरु , पूरे विश्व को आर्य बनाने व वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना गुरुकुलों के विकास व विस्तार से ही हो सकती है |
आर्य समाजों में गुरुकुल होने से परिसर में चौबीस घंटे गहमागहमी रहती है और जनता पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है। हो सकता है कुछ लोग आपको हतोत्साहित करें, आपके मार्ग में कांटे बिछाएं, परन्तु यदि दृढ़ इच्छा शक्ति है, ऋषि के प्रति समर्पण है तो आप अपने उद्देश्य में अवश्य सफल होंगे। शुभ कर्मों में ईश्वर भी सहाय होता है। हमने जब आर्य समाज भवन के अन्दर गुरुकुल स्थापित करने का निश्चय किया तो उस समय भवन, यज्ञशाला, पुस्तकालय आदि कुछ भी न था, कोष में केवल पांच सौ रुपये थे, भारी विरोध था, परन्तु हमारे दृढ़ निश्चय के आगे सब बाधाएं व सब विरोधी धराशायी होते गए। जैसा व्यवहार स्वामी श्रद्धानन्द जी के साथ हुआ था, कुछ ऐसा व्यवहार हमारे साथ भी हुआ, परन्तु हम उसकी चर्चा करना उचित नहीं समझते। स्वामी श्रद्धानन्द जी के साथ कुछ दुष्ट लोगों ने जो किया, उसका संक्षिप्त वर्णन उन्होंने अपनी पुस्तक " दु:खी दिल की दास्ताँ" में लिखा है।
आर्य समाज रुपी आन्दोलन को सफल बनाने के लिए कुछ उपाय-
१. आर्यसमाज भवनों में गुरुकुलों को स्थापित करना।
२.पहले से चल रहे गुरुकुलों का खुले दिल से सहयोग करना।
३.सोशल मीडिया पर वैदिक मान्यताओं का प्रचार प्रसार करना, अन्धविश्वास पाखंड का निरन्तर खण्डन करते रहना और लोगों की शंकाओं का समाधान करने के लिए समय निकालना।
४. स्कूल कालिजों में जाकर अध्यापकों व मेधावी विद्यार्थियों को सप्रेम "सत्यार्थ प्रकाश" भेंट करना।
५. घरों में नित्य सन्ध्योपसना व यज्ञ करना और त्योहारों पर बड़े बड़े यज्ञों का आयोजन करना।
६. बच्चों को हमारे द्वारा तैयार किए गए वाक्य स्मरण करवाना।
परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना है कि ऋषि मुनियों के देश आर्यवर्त्त में पुनः स्थान-स्थान पर गुरुकुल, गौशालाएं व यज्ञशालाऐं हों!
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स्वामी श्रद्धानन्द जी द्वारा लिखी पुस्तक "दु:खी दिल की दास्तां" का एक अंश - "महर्षि दयानन्द सरस्वती के आर्ष पाठ विधि" विषयक आदेश का पालन करके उसे क्रियान्वित करने के लिए मैंने नि:स्वार्थ भाव से जो प्रयत्न किये, उस कार्य में आर्य जनता ने मुझे पूरा सहयोग किया। उसी सहयोग के कारण यह गुरुतर कार्य पूरा हो पाया है, इसके लिए सहयोगी आर्य जन बधाई के पात्र हैं। परन्तु आर्य जगत् का नेतृत्व करने वाले अनेक व्यक्तियों ने गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना और उसमें पढ़ाये जाने वाले विषयों को लेकर मेरा घोर विरोध प्रारम्भ कर दिया। मैंने गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना के लिए तीस हजार से अधिक रुपया एकत्र करके आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब को सौंप दिया और उसके प्रधान आदि से निवेदन किया कि आप लोग गुरुकुल को विधिवत् चलायें, परन्तु उन लोगों ने गुरुकुल चलाना तो दूर मुझे अपमानित करने के लिए रुपये गबन करने का आरोप लगाया, मुझे गुरुडम चलाने वाला बताया और कहा कि मुंशीराम, किसी भी सामाजिक कार्य के लिए विशेष पद पर कार्य करने के योग्य नहीं है, इसको दिया गया धन भी यह अपने कार्य में लगाता है, इसका त्याग केवल दिखावा है वकालत नहीं चली, इसलिए इसने गुरुकुल चलाने की आड़ ली है। इस प्रकार के असत्य आरोप मौखिक और लिखित रूप में मेरे विरुद्ध लगातार आर्य नेताओं की ओर से लगाए जाते रहे हैं। मैंने इनकी उपेक्षा की, परन्तु अनेक सुहृदय व्यक्तियों ने जोर देकर कहा कि इन कुटिलमति लोगों के आक्षेपों का उत्तर अवश्य दिया जाए, नहीं तो जनता आप को ही दोषी मान लेगी। अत: मैंने उन लोगों के आरोप और उनके उत्तर इस पुस्तक में देकर जनता के सामने सच्चाई प्रस्तुत कर दी है । इस उत्तर के पढ़ने से जनता का भ्रम दूर होकर यह भी पता लग जाएगा कि आर्य समाज के वर्तमान तथाकथित नेता किस सीमा तक नीचे गिर सकते हैं।"
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सम्पूर्ण जीवन और संपत्ति आर्य समाज को देने वाले स्वामी श्रद्धानन्द जी तक पर चौदह हजार रुपए के गबन का आरोप लगाने वाले आज उनकी शोभा यात्रा निकालते हैं !! डी ए वी वालों ने पं गुरुदत्त विद्यार्थी जी को जीते जी मार डाला, आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब ने स्वामी श्रद्धानंद जी को जीते जी मार डाला और आर्य प्रादेशिक सभा ने हमें जीते जी मार डाला।
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भगवान! आर्यों को पहली लगन लगा दे!