आर्य शब्द की ब्युतपति/ हिन्दू शब्द की ब्युतपति
आर्य शब्द की व्युत्पति / हिन्दू शब्द की व्युत्पति
"ॠ गतौ" धातु से "आर्य"शब्द सिद्ध होता है। जिसका अर्थ है "गतिः प्रापणार्थे" अर्थात् गति-ज्ञान, गमन, प्राप्ति करने और प्राप्त कराने वाले को आर्य कहते हैं। प्रमाण:- आर्य ईश्वरपुत्रः। (निरुक्त 6/26) अर्थात् आर्य ईश्वर के पुत्र का नाम है।
वेद मे ईश्वर कहता है कि- अहं भूमिमददामायार्य।
(ॠ. 4/26/2 ) अर्थात् मैं इस भूमि का राज्य आर्यो के लिये प्रदान करता हूँ।
भगवान ने आदेश दिया कि "सम्पूर्ण विश्व को आर्य बनाओ"
इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम्।
अपघ्रन्तो अराव्णः।। (ॠ.9/63/5)
अर्थ--- हे परम ऐश्वर्य युक्त आत्मज्ञानी! तुम आत्मशक्ति का विकास करते हुये गतिशील, प्रमादरहित, होकर कृपणता, अदानशीलता, अनुदारता, ईर्ष्या आदि का विनाश करते हुये सारे संसार को आर्य बनाओ।
प्राचीन कोष मे "आर्य" शब्द के अर्थ:--
संस्कृत के शब्दकल्पद्रुम, वाचस्पत्य, बृहदभिधानादि कोषों मे आर्य शब्द के अर्थ निम्न पाये जाते है----
आर्यः :-- पूज्यः, श्रेष्ठः, धार्मिकः, धर्मशीलः, मान्यः, उदारचरितः, शान्तचित्तः, न्यायपथावलम्बी, सततं कर्त्तव्य-कर्मानुष्ठाता यथोक्तम्।
महर्षि वेदव्यास जी ने निम्न आठ गुणों से युक्त व्यक्ति को आर्य कहा है- ज्ञानी तुष्टश्च दान्तश्च सत्यवादी जितेन्द्रियः।
दाता दयालुर्नम्रश्च स्यादार्यो ह्यष्टभिर्गुणैः।।
अर्थ:- जो ज्ञानी हो, सदासन्तुष्ट रहने वाला हो, मन को वश में करने वाला हो, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, दानी, दयालु और नम्र हो, वह आर्य कहलाता है।
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संस्कृत व्याकरण में तो कहीं हिन्दू शब्द है ही नहीं, अरबी- फ़ारसी- लिपियों में व्याख्याकारों के संग्रह से हिन्दू शब्द का अर्थ -
हिन्दू दर मुहावरा फारसियां ब मअने दुज़दो रहज़नों ग़ुलाम मे आयद। अर्थ – हिन्दू शब्द फ़ारसी भाषा के अनुसार चोर, डाकू, रहजन (मार्ग का लुटेरा) और ग़ुलाम (दास, बंदी) के अर्थो में आता है | (सन्दर्भ ग़यास ग़यास नामी कोष)
हिन्दू बकसर ग़ुलाम व बन्दह, काफ़िर व तेरा। अर्थ : हिन्दू का अर्थ ग़ुलाम, कैदी, काफ़िर और तलवार है। (सन्दर्भ कशफ कशफ नामी कोष )
चे हिन्दू हिंदुए काफ़िर चे काफ़िर, काफ़िर रहजन। चे रहज़न रहज़ने ईमान , अर्थ : हिन्दू क्या है ? हिन्दू काफ़िर है। काफ़िर क्या है ? काफ़िर रहज़न है। रहज़न क्या है ? रहज़न ईमान पर डाका मारने वाला है। (सन्दर्भ चमन बेनज़ीर)
क्या अभी भी अपने को हिन्दू कहोगे ?
संस्कृत के सिंधु शब्द का किसी भारतीय भाषा में "हिन्द" रूप नहीं हुआ,क्योंकि संस्कृत के किसी भी शब्द के आरम्भ का असंयक्ुत "स" प्राकृत भाषा में भी यथावत "स" ही रहा है,परिवर्तित नहीं हुआ। यथा- सप्ुत - सत्तु , सप्त- सत्त , सद्भाव -सब्भाव, सौभाग्य - सोहग्ग, सत्य - सच्च,सखु - सहु,सन्ैय - सेण्ण,सर्प -र्प सप्प,सर्व - र्व सव्व । प्राकृत भाषाओं सेआगे परिवर्तन होकर अपभ्रंश भाषाएँ अस्तित्व में आईं। उन अपभ्रंशों से परिवर्तित होकर आजकल की हिन्दी, पंजाबी,गुजराती, बंगला,मराठी आदि भाषाओं की परम्परा चली।इनमें भी सर्वत्र शब्द के आरम्भ का "स" यथावत् बना रहा है,"ह" नहीं हुआ है। यथा पंजाबी में सत्त और हिन्दी में सात का स ्संस्कृत के "सप्त" के स ्को यथावत्त रखे हुए है। आज के इस्लामी पाकिस्तान में लगभग पचहत्तर वर्ष के बाद भी सिधं नदी"सिधं दरिया"और सिधं सूबा ही है|
हिन्दू हिन्दी हिन्दुत्व हिन्दुइज्म हिन्दुस्तान शब्द वेद उपनिषद दर्शन रामायण महाभारत मनुस्मृति गीता जैसे किसी प्राचीन धार्मिक व ऐतिहासिक ग्रन्थ में नहीं| किसी भारतीय व्याकरण शास्त्र में भी ये शब्द नहीं | ये शब्द मुगल काल की देन हैं और दास्ता के प्रतीक हैं| फारसी भाषा में हिन्दू शब्द के अर्थ हैं- चोर काफिर लुटेरा | हिन्दू कोई धर्म नहीं, एक ऐसी जीवनशैली है जिसमें आस्तिक नास्तिक, शराबी कबाबी , मांसाहारी शाकाहारी सब आते हैं | हिन्दुओं के अठारह पुराणों मे वेद विरुद्ध काल्पनिक किस्से कहानियों की भरमार है, शिवपुराण में दारुवन की कथा में शिवलिंग का इतिहास पढो, शर्म से सिर झुक जाएगा| मुसलमान व ईसाई लोग आर्य वा वैदिक धर्मी तो बन सकते हैं परन्तु मूर्तियों की पूजा करने के लिए हिन्दू नहीं बन सकते| मूर्ख हैं वे लोग हैं जो परमात्मा की मूर्तियां बना कर उनमें प्राणप्रतिष्ठा का ढोंग करते हैं, शिवलिंग को दूध से नहलाते हैं वा उसका चिता की राख आदि से अभिषेक करते हैं| उज्जैन महाकाल, केदारनाथ, अमरनाथ व काशी विश्वनाथ में शिवलिंग की ही पूजा होती है! महर्षि दयानंद जी ने अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में हर प्रकार की मूर्ति पूजा व शिवलिंग पूजा का तर्क व प्रमाण सहित खण्डन किया है | समस्त ऋषि मुनियों व कबीर नानक जैसे महापुरुषों ने पाषाण पूजा का विरोध किया है| लगभग सभी राजनीतिक दल व राजनेता वोट बैंक की राजनीति के चलते जनता को गुमराह करते हैं| न तो हिन्दू हिन्दुत्व शब्द सनातन हैं और न ही मूर्तियों की पूजा अर्चना सनातन है, सनातन तो एक ही धर्म है - वैदिक अर्थात ईश्वरीय वाणी वेदानुकूल आचरण | हमारे देश का मूल नाम आर्यवर्त भी सनातन है| सनातन काल से आर्यों की एक ही पूजा पद्धति रही है- यज्ञ व योग |
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- डा मुमुक्षु आर्य