परमात्मा का ध्यान करने की सरलतम विधि

*सच्चे रामभक्त कौन ? अयोध्या में राममंदिर कैसा हो ?*

*मन्दिर मस्जिद को लेकर बडी चर्चा है, बडी राजनीति है, बडी कट्टरता है, बडी आस्था है, बडे झगड़े हैं ....परन्तु अज्ञान,स्वार्थ व वोट बैंक की राजनीति के चलते कोई यह कहने का साहस नहीं करता कि परमात्मा की अराधना के लिये किसी मंदिर मस्जिद की तो जरुरत ही नहीं । परमात्मा इस प्रकार की नादानियों से प्रसन्न भी नहीं होता । मन्दिरों मस्जिदों के निर्माण, रखरखाव व सुरक्षा पर अरबों खरबों खर्च करना और उनके लिये झगड़े फसाद करना निपट मूर्खता है, महापुरुषों को परमात्मा मान कर पूजना वा उनकी बडी बडी मूर्तियां खडी करना भी मूर्खता है । परमात्मा का तो आदेश है कि वेदानुकूल आचरण करो, नित यज्ञ करो, योग करो और महापुरुषों के चित्र की नहीं चरित्र की पूजा करो । ऋषि दयानंद का मानना था कि मन्दिर बनाना अपनी भावी सन्तति को सदियों तक अविद्या की गहरी खाई में धकेलना है ।*

*राम जी की मूर्तियां बना कर उनमें झूठमूठ की प्राण प्रतिष्ठा करने वा उनका हार श्रंगार करने से कुछ लाभ नहीं होगा । राम के सच्चे भक्त बनना है तो उनकी तरह वीर बनो,सयंमी बनो,वेद पढो, माता पिता की सेवा करो, यज्ञ करो, सब जीवों से प्रेम करो और परमपिता परमात्मा के निज ओम् नाम का जप व ध्यान करो । मांस अंडा बीडी सिगरेट शराब तम्बाकू गुटका आदि का प्रयोग करने वाले राम के भक्त नहीं हो सकते । मां बहिन की गालियां निकालने वाले रामभक्त नहीं हो सकते । मूर्तियों की पूजा अर्चना, मूर्तियों को दूध से नहलाना, मूर्तियों का विसर्जन, कांवड यात्रा, रथ यात्रा, मानसरोवर यात्रा,अमरनाथ यात्रा, गंगा स्नान आदि को धर्म व मुक्ति का मार्ग मानने वाले रामभक्त नहीं हो सकते । मूर्तियों पर जल दूध फल फूल चढाने वाले रामभक्त नहीं हो सकते । माता पिता की आज्ञा का तिरस्कार करने वाले व उन्हें बृद्धाश्रमों में भेजने वाले रामभक्त नहीं हो सकते । हिंसा चोरी झूठ छल कपट नफरत व गुण्डागर्दी में विश्वास रखने वाले रामभक्त नहीं हो सकते । राम एक ऐसे समाज का प्रतिनिधित्व करते थे जो पूर्णतया आर्य था, सब प्रकार के अन्धविश्वास पाखंड से मुक्त था, याज्ञिक था, राम सच्चे आर्यसमाजी थे, उन जैसा आर्यसमाजी मिलना दुर्लभ है । राम सच्चे साधु सन्यासियों व ऋषि मुनियों का बहुत सम्मान करते थे । राम आज होते तो वे ऋषि दयानंद जी का भी बहुत सम्मान करते, उनको अपना गुरु मानते ! यदि वास्तव में राम के भक्त हो और रामराज्य लाना चाहते हो तो गांव गांव में गुरुकुल, गौशाला व यज्ञशाला स्थापित करो । राम के मन्दिर व राम की बडी बडी मूर्तियां बनाने से राम प्रसन्न नहीं होते, राम को प्रसन्न करना है तो राम के आदर्शों को जीवन में धारण करो,  राम की तरह आर्य बनो, याज्ञिक बनो, तभी जय श्री राम का नारा सार्थक होगा ।*
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प्राणप्रतिष्ठा के बाद मूर्तियां प्राणवान क्यों नहीं होती ? अपनी रक्षा क्यों नहीं कर पाती ? उनकी रक्षा के लिये सरकारों को करोड़ों अरबों क्यों खर्च करने पडते हैं ? मृत माता पिता को प्राणप्रतिष्ठा कर जीवित क्यों नहीं कर लिया जाता ? सच्चाई यही है कि मूर्ति पूजा व उनमें प्राणप्रतिष्ठा निपट अन्धविश्वास पाखंड व भेडचाल है, वेदादि शास्त्रों के विरुद्ध है । कबीर, नानक, रविदास व दयानंद जैसे करोडों ऋषिमुनियों ने इसकी निन्दा की है । राम ने शिवलिंग की पूजा कभी नहीं की, यह तुलसीदास जी की कल्पना मात्र है । श्री राम,श्रीकृष्ण व सब ऋषिमुनि तो नित्य सन्ध्या हवन करते थे,ध्यान करते थे, वेदानुकूल आचरण को ही धर्म मानते थे । हिन्दू मुस्लिम सिक्ख जैन बौद्ध ईसाई धर्म नहीं मतामतान्तर हैं, इन सबकी अपनी अपनी मान्यताएं हैं, रीति रिवाज हैं, पूजा पद्धतियां हैं, भगवान हैं,परस्पर मतभेद हैं, मनभेद हैं । जब तक एक धर्म वेद वा वैदिक, एक परमात्मा ओम् ,एक पूजा पद्धति यज्ञ व योग न होगी परस्पर प्रेम व एकता की स्थापना नहीं हो सकती ।
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*राम जन्म भूमि अयोध्या में ऐसा राम मन्दिर हो जिसके अन्दर हजारों विद्यार्थियों का विशाल गुरुकुल हो, हजारों गऊओं की गौशाला हो, भव्य यज्ञशाला हो और बाल्मिकी रामायण पर आधारित राम के जीवन को दर्शाती चित्रदीर्घा हो परन्तु किसी प्रकार की मूर्ति पूजा वा शिवलिंग पूजा जैसा अवैदिक कर्मकांड न हो । धर्म का मूल वेद है। वेदानुकूल आचरण करना ही धर्म है। यज्ञ, योग व ध्यान ही हमारे देश की सनातन वैदिक संस्कॄति है। पाषाण पूजा, पशु बलि, शिवलिंग पूजा आदि वाममार्गी तंत्राचार्यों द्वारा मानी जाने वाली असुरी संस्कृति है।*
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*आज अनेक प्रकार की रामायण उपलब्ध हैं । कुछ रामायण में राम के इतिहास को बहुत तोड मरोड कर पेश किया गया है । कुछ लोग दुष्प्रचार करते हैं कि राम शुद्रों से भेदभाव करते थे, उन्होंने शम्भूक नामक एक शुद्र का वेदादि शास्त्र पढने के कारण वध कर दिया था । सत्य तो यह है कि गुरुकुलों में सब वर्णों के विद्यार्थियों के लिए बिना किसी भेदभाव के समान शिक्षा, खानपान, वस्त्र आदि का प्रवन्ध था । मध्य काल में जब वेद विद्या का लोप होने लगा था, उस काल में ब्राह्मण व्यक्ति अपने गुणों से नहीं अपितु अपने जन्म से समझा जाने लगा था , शुद्र को नीच समझा जाने लगा था, नारी को नरक का द्वार समझा जाने लगा था, मनुस्मृति में जातिवाद का पोषण करने वाले श्लोकों को मिला दिया गया था, उस काल में वाल्मीकि रामायण में शम्भूक वध वाला उत्तर काण्ड मिला दिया गया ।*

 *-डा मुमुक्षु आर्य*

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