मूर्ति पूजा पाखंड-1
मूर्तियों में प्राणप्रतिष्ठा कर उन्हें भगवान बनाने का नाटक क्यों करते हो ? जब तुम्हारे मन्दिरों में पडे भगवानों को तोडा जा रहा था, तब तुम्हारे भगवान क्या कर रहे थे? आज भी तुम्हारे इन भगवानों के गहने वस्त्र चोरी हो जाते हैं तो वे कुछ नहीं कर पाते! मन्दिरों में पडी मूर्तियों के आगे पैसे चढाना बंद कर दो तो सब पण्डे पुजारी भाग खडे होंगे! देश विदेश के सब मन्दिरों में आधुनिक शिक्षा के साथ साथ वेदादि शास्त्र पढने पढाने की व्यवस्था होनी चाहिए , यही मन्दिरों का सही सदुपयोग होगा | ईश्वर के सच्चे स्वरूप को जान कर उसकी उपासना करना और जनता को अन्धविश्वास पाखंड की बेडियों से मुक्त करना सब मनुष्यों का परम धर्म है|
वेदादि शास्त्रों में ईश्वर का सच्चा स्वरूप- ईश्वर सच्चिदानंदस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है, उसी की उपासना करनी योग्य है। परमात्मा में अनन्त गुण होने से उसके अनन्त नाम हैं, मुख्य नाम ओम् है|
God is existent, Blissful. Formless, Omnipotent,Just, Merciful, Unborn, Endless, Unchangeable, Beginningless, Uncomparale, Support of all, Master of all, Omnipresent, Omniscient, Unageing, Immortal, Fearless, Eternal, Holy, and Maker of all. He alone is worthy of being worshipped. God has innumerable attributes, so having innumerable names, Primary name is Aum.
निराकार ईश्वर की पूजा सबसे सरल है इसके लिये कोई आडम्बर नहीं करना पडता।बस ध्यान मुद्रा में बैठ कर ओम् वा गायत्री का अर्थ सहित जप करना है।इसे बच्चे बुड्ढे सब कर सकते हैं।इसके लिये किसी मन्दिर मस्जिद गिरजे गुरुद्वारे वा जल दुध फल फूल प्रसाद आदि की आवश्यकता नहीं।
धर्म सार्वदेशिक सार्वभौमिक सार्वजनिक वा यूनिवर्सल होता है, जिसे संस्कृत में सनातन कहते हैं, इसका कोई पर्यायवाची शब्द नहीं है । धर्म का अर्थ है सत्य, अहिंसा, करुणा, मैत्री, वात्सल्य, परोपकार, क्षमा इत्यादि। अधर्म सिर्फ अनर्थ करता है जिसका विशेषण है क्रोध, हिंसा, अभिमान, मोह-माया लोभ-लालच इत्यादि।
धर्म अधर्म व आत्मा परमात्मा का का वास्तविक स्वरूप जनाने के लिए ऋषि दयानंद ने पूरे भारत का भ्रमण किया | उनका मानना था कि "जब तक एक धर्म, एक ईश्वर, एक धर्म ग्रन्थ, एक लक्ष्य नहीं बनता तब तक एकता सम्भव नहीं| अब तो बहुत से मत वाले होने से बहुत सा दु:ख विरोध बढ़ गया है! इसका निवारण करना बुद्धिमानों का काम है ! परमात्मा सब के मन में सत्य मत का ऐसा अंकुर डालें कि जिससे मिथ्या मत शीघ्र ही प्रलय को प्राप्त हो ! इसमें सब विद्वान लोग विचार कर विरोधभाव छोड़कर अविरुद्धमत के स्वीकार से सब जने मिलकर सबके आनंद को बढ़ावें !"
ऋषि दयानंद ने मानव जाति के कल्याण के लिए अनेक ग्रन्थ लिखे, उनमें से सत्यार्थप्रकाश प्रमुख ग्रन्थ है, यह ग्रन्थ वेदों उपनिषदों का सार है, इसमें धर्म अधर्म, आत्मा परमात्मा, बन्धमोक्ष, पुनर्जन्म का तर्क व प्रमाण सहित वर्णन है| इसमें हिन्दू मुस्लिम सिक्ख जैन बौद्ध ईसाई आदि मतमततान्तरों द्वारा फैलाए गए पाखंड की समीक्षा भी बडे सुन्दर ढंग से की गई है ,आज के युग में इस ग्रन्थ का महत्व भगवद्गीता से भी अधिक है|
ऋषि दयानन्द ने मतमतान्तरों के ठेकेदारों को अपने तर्क के तीरों से ऐसा घायल किया है कि वे बेचारे पीड़ा से अभी तक कराह रहे हैं। अभी भी समय है कि दुराग्रह छोड़ वेदों की शरण में आओ और अन्य ग्रन्थों के वेदानुकूल अर्थों को ही ग्रहण करो, इसी में सभी का कल्याण है।
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- डा मुमुक्षु आर्य