काशी में पाखंड लीला व शिवलिंग का इतिहास
काशी में पाखंड लीला व शिवलिंग का इतिहास-
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१. प्रलय काल में भी काशी का विनाश नहीं होता, भगवान विष्णु ने सृष्टि रचना के लिए जहाँ शिवलिंग की पूजा की थी ,भगवान शंकर ने काशी को अपने त्रिशूल पर धारण कर रखा है, शिव लिंग अर्थात शिव का लिंग बाबा विश्वनाथ है अर्थात समस्त विश्व का नाथ है , कथित शिवलिंग का दूध, जल, शहद आदि से अभिषेक करने से मुक्ति हो जाती है | शिवलिंग पर गंगा नदी का जल सीधा सीधा पडे इसकी व्यवस्था की गई है|
२. इस कथित शिवलिंग के दर्शन करने के लिए करोड़ों अरबों का काशी कौरीडोर बनाया गया है | यह कौरीडोर आध्यात्मिक चेतना को जागृत करने का नहीं, आध्यात्मिक चेतना को कुण्ठित करने कि कौरिडोर है, इस तथाकथित विश्वनाथ, भोले नाथ, कालभैरव के दर्शन के लिए सैंकड़ों रुपये तक की टिकट भी लेनी पड़ती है |
३. इस शिवलिंग की सुरक्षा के लिए चौबीस घंटे पुलिस व कमांडो तैनात रहते हैं, यदि सचमुच में यह शिवलिंग विश्वनाथ वा परमात्मा है तो इनकी सुरक्षा के लिए इतनी पुलिस क्यों?
काशी विश्वनाथ, केदारनाथ, अमरनाथ व उज्जैन महाकाल में भी यही पाखंड लीला है, अन्धविश्वास पाखंड का जितना प्रचार प्रसार सरकार व मीडिया द्वारा गत आठ वर्षों में हुआ है कभी नहीं हुआ | ऋषि दयानंद के साथ काशी शास्त्रार्थ में काशी के पण्डे पुजारी वेदों में मूर्ति पूजा वा शिवलिंग पुजा जैसे पाखंड सिद्ध न कर पाए तो हो हल्ला व गाली गलौज करते हुए भाग खड़े हुए थे |
शिवलिंग का इतिहास- शिव पुराण के अनुसार दारू नाम का एक वन था , वहां के निवासियों की स्त्रियां उस वन में लकड़ी लेने गईं , महादेव शंकर जी नंगे कामियों की भांति वहां उन स्त्रियों के पास पहुंच गये ।यह देखकर कुछ स्त्रियां व्याकुल हो अपने-अपने आश्रमों में वापिस लौट आईं , परन्तु कुछ स्त्रियां उन्हें आलिंगन करने लगीं ।उसी समय वहां ऋषि लोग आ गये , महादेव जी को नंगी स्थिति में देखकर कहने लगे कि -‘‘हे वेद मार्ग को लुप्त करने वाले तुम इस वेद विरूद्ध काम को क्यों करते हो ?‘‘यह सुन शिवजी ने कुछ न कहा ,तब ऋषियों ने उन्हें श्राप दे दिया कि - ‘‘तुम्हारा यह लिंग कटकर पृथ्वी पर गिर पड़े‘‘उनके ऐसा कहते ही शिवजी का लिंग कट कर भूमि पर गिर पड़ा और आगे खड़ा हो अग्नि के समान जलने लगा , वह पृथ्वी पर जहां कहीं भी जाता जलता ही जाता था जिसके कारण सम्पूर्ण आकाश , पाताल और स्वर्गलोक में त्राहिमाम् मच गया , यह देख ऋषियों को बहुत दुख हुआ । इस स्थिति से निपटने के लिए ऋषि लोग ब्रह्मा जी के पास गये , उन्हें नमस्ते कर सब वृतान्त कहा , तब - ब्रह्मा जी ने कहा - आप लोग शिव के पास जाइये , शिवजी ने इन ऋषियों को अपनी शरण में आता हुआ देखकर बोले - हे ऋषि लोगों ! आप लोग पार्वती जी की शरण में जाइये । इस ज्योतिर्लिंग को पार्वती के सिवाय अन्य कोई धारण नहीं कर सकता । यह सुनकर ऋषियों ने पार्वती की आराधना कर उन्हें प्रसन्न किया , तब पार्वती ने उन ऋषियों की आराधना से प्रसन्न होकर उस ज्योतिर्लिंग को अपनी योनि में धारण किया । तभी से ज्योतिर्लिंग पूजा तीनों लोकों में प्रसिद्ध हुई तथा उसी समय से शिवलिंग व पार्वतीभग की प्रतिमा या मूर्ति का प्रचलन इस संसार में पूजा के रूप में प्रचलित हुआ | (ठाकुर प्रेस शिव पुराण चतुर्थ कोटि रूद्र संहिता अध्याय 12 पृष्ठ 511 से 513}
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ईश्वर सच्चिदानंदस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है, उसी की उपासना करनी योग्य है।ईश्वर सर्वशक्तिमान का यह अर्थ नहीं कि वह कुछ भी कर सकता है, अवतार भी सकता है | ऐसे अनेक कार्य हैं जो ईश्वर नहीं कर सकता जैसे- ईश्वर अपने आपको मार नहीं सकता, ईश्वर ऐसा पत्थर नहीं बना सकता जिसे स्वयं ईश्वर उठा न सके, अपने जैसा दूसरा ईश्वर पैदा नहीं कर सकता, अज्ञानता पूर्ण कर्म, पाप कर्म, चोरी आदि नहीं कर सकता। सर्वशक्तिमान का वास्तविक अर्थ है कि ईश्वर सृष्टि उत्पत्ति, पालन, प्रलय व कर्मफल देने में किसी की सहयोग नहीं लेता, ये सब कर्म करने में वह सर्वव्यापी निराकार ईश्वर पूर्णतया सक्षम है |
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- डा मुमुक्षु आर्य