दो बोध कथाएं
दो बोध कथाएं- ईश्वर एक, धर्म एक, धर्म ग्रंथ एक:-
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अन्वेको वदति यद्ददाति तद्रूपा मिनन्तदपा एक ईयते।विश्वा एकस्य विनुदस्तितिक्षते यस्ताकृणोः प्रथमं सास्युक्थ्यः॥
(ऋग्वेद २-१३-३)
हे मनुष्यों, आपके कल्याण अर्थात् धर्म अर्थ काम और मोक्ष की प्राप्ति के लिए ही मैंने यह वेदों का ज्ञान प्रगट किया है। मैं ही इस विशाल सृष्टि का कर्ता धर्ता व हर्ता हूं। मैंने ही तुम्हारे सुख के लिए सब पदार्थों को रचा है। वेदों के स्वाध्याय से ज्ञान प्राप्त कर उसे कर्म में परिवर्तित करो।
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बोध कथा १- धर्माचार्यों का संयुक्त अधिवेशन:-
एक बार एक वेदज्ञ, विद्वान बुद्धिमान शक्तिशाली राजा ने पृथ्वी ग्रह पर प्रचलित सब धर्मों के आचार्यों की सभा बुलाई और उन्हें अपने अपने धर्म की श्रेष्ठता बताने को कहा -
1.पण्डित--तंत्र, पुराण,अवतार, मूर्ति पूजा, ग्रहपूजा, शिवलिंग पूजा, तीर्थ यात्रा आदि में श्रद्धा रखने से मुक्ति हो जाती है| हिन्दु धर्म ही सनातन है,हमारे तिलक छापे से तो यमराज भी डरता है, हमारे देवी देवताओं की मूर्तियों की पूजा में ही सबका कल्याण है ।
2. वेदान्ती--हम साक्षात ब्रह्मा हैं,जगत सब मिथ्या है,जीव भाव छोडने से मुक्ति हो जाती है,जीव परमात्मा का ही अंश है और हमारा अद्वैत मत ही असली मत है,शेष सब अविद्या से ग्रस्त हैं।
3. जैन बौद्ध साधु--जैन बौद्ध धर्म के बिना सब धर्म खोटा,जगत का कर्ता अनादि ईश्वर कोई नहीं,जगत अनादि काल से वैसे का वैसा है और बना रहेगा| हमारे चौबिस तीर्थंकरों व महात्मा बुद्ध आदि की मूर्तियां बना कर पूजने में ही मुक्ति है ।
4.पादरी--बिना ईसा, यीशू वा यहोवा पर विश्वास के पवित्र होकर कोई मुक्ति को नहीं पा सकता,ईसा यीशू ने सबके प्रायश्चित के लिए अपने प्राण देकर दया प्रकाशित की है,सब रोगों से छूटना चाहते हो तो राजन ! तू हमारा चेला हो जा ।
5 .मौलवी--लाशरीक खुदा,उसके पैगम्बर और कुरान शरीफ के माने बिना कोई निजात नहीं पा सकता,जो इस मजहब को नहीं मानता वह बाजिबलकातल्के के है|
ऐसे ही कबीर, नानक, दादू, पलटू ,राधा स्वामी, निंरकारी, शैव,वैष्णव,ब्रह्मकुमारी आदि मत वालों ने अपने अपने मत की बडाई की|यह सब सुन राजा को निश्चय हुआ कि ये सब कुशल दुकानदार की तरह अपना अपना माल बेच रहे हैं|राजा ने सबसे प्रश्न किया कि हिंसा न करना,सदैव सत्य बोलना,चोरी न करना,असहायों की मदद करना,संयम में रहना,ईश्वर को कण कण में मानना,अपनी अन्तरात्मा के विरुद्ध कोई काम न करना,जलवायु को शुद्ध रखना सत्य सनातन धर्म है या नहीं ?
सभी ने एक मत से कहा कि हां ये सब धर्म है| पुन: राजा ने प्रश्न किया कि ये सब धर्म है तो इतने धर्म क्यों बना रखे हैं ??
वे सब बोले - जो ऐसा प्रचार करें तो हमको कौन पूछे ?
ऐसा उतर सुन राजा ने सब पाखण्डियों को अपनी प्रजा को गुमराह करने के कारण बन्दी बना लिया और उक्त एक धर्म वेद की शिक्षाओं का प्रचार प्रसार करने में अपनी पूरी शक्ति लगा दी| मन्दिर मस्जिद चर्च आदि सब कथित धर्म स्थलों को वैदिक शिक्षाओं का केन्द्र बनाने का आदेश दे दिया, सब विद्यालयों में यज्ञ योग व वेद अनिवार्य कर दिया, तन्त्र पुराण कुरान बाईबल आदि सब वेदविरुद्ध ग्रन्थों पर प्रतिबन्ध लगा दिया , मांस अंडा बीडी सिगरेट शराब तम्बाकू व वेश्याओं की दुकानों को बन्द करवा दिया, गांव गांव में गुरुकुल गौशाला खोलने का आदेश दे दिया।
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बोध कथा २ - एक बार एक शिष्य ने अपने गुरु से कहा कि उसे स्वर्ग के दर्शन करने हैं। गुरु जी अपनी योग विद्या के द्वारा उसे स्वर्ग में ले गए। शिष्य ने स्वर्ग में देखा कि एक बहुत बड़ा जलूस निकल रहा है उस जलूस में एक सुन्दर से रथ पर एक सुन्दर सा धनुर्धारी पुरुष बैठा है और उसके पीछे करोड़ों लोग हैं। शिष्य ने पुछा- "गुरु जी, यह कौन है?" गुरु ने कहा "बेटा यह श्री रामचंद्र जी हैं इनके पीछे करोड़ों लोग हैं।" इसी प्रकार कृष्ण, बुध्द, महावीर, शंकराचार्य,माधमाचार्य, मुहम्मद, ईसा, कबीर, नानक आदि कई महापुरुषों के जलूस निकले। सब के पीछे करोड़ों लोग थे। अन्त में अति सुन्दर अलौकिक पुरूष जिसका प्रकाश सब ओर फैल रहा था, पैदल ही जा रहा था, परन्तु उसके पीछे कोई नहीं था। शिष्य बड़ा हैरान हुआ । अपने गुरु से पूछा 'गुरु जी, यह कौन है ?' गुरु ने उत्तर दिया 'बेटा यह ईश्वर है, इसके पीछे कोई नहीं, न ही कोई इसकी सुन रहा है। शिष्य ने कहा 'महाराज जी, यही सब तो पृथ्वी पर भी हो रहा है।' गुरु ने कहा ''बेटा! स्वर्ग नरक कुछ नहीं,सब कुछ यही पर है। स्वर्ग का अर्थ सुख विशेष और नरक का अर्थ दुख विशेष है। जो शुभ अशुभ कर्मों के आधार पर इसी पृथ्वी पर ईश्वर दे देता है। वेदानुकूल आचरण करने व ध्यान आदि निष्काम करने से वह परमेश्वर मनुष्य को सब दु:खों से छुडवा कर मोक्ष भी प्रदान कर सकता है।
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अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य अपरिग्रह शौच संतोष तप स्वाध्याय ईश्वर प्रणिधान आदि शुभ गुणों को धारण करना धर्म है। वेदानुकूल आचरण करना धर्म है। धर्म व आस्था के नाम पर प्रचलित अन्धविश्वास पाखंड धर्म नहीं है। हिन्दू मुस्लिम सिख जैन बौद्ध ईसाई व नास्तिक होना धर्म नहीं है। तन्त्र पुराण कुरान बाइबिल आदि धर्म ग्रंथ नहीं हैं, इनमें काल्पनिक किस्से कहानियों की भरमार है। असली धर्म ग्रंथ वेद हैं।
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- डा मुमुक्षु आर्य