गायत्री मंत्र- अर्थ भावार्थ पते/ विग्रह पूजा
धर्म क्या है ? अधर्म क्या है? ईश्वर क्या है?
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धर्म क्या है? - धर्म शब्द संस्कृत की धृ धातु से लिया गया है जिसका अर्थ है धारण करने योग्य। अर्थात् संसार में वह सभी बातें जो कि ज्ञान विज्ञान सम्मत हों धारण करना "धर्म" हैं।महर्षि दयानंद कहते हैं कि जो पक्षपात रहित न्यायाचरण व सत्याभाषणादि युक्त ईश्वराज्ञा वेदों से अविरूद्ध हो धर्म कहाता है और जो इसके विरूद्ध हो वह अधर्म कहाता है। मनु महाराज धर्म के दस लक्षण बताते हुए कहते हैं कि- धृति क्षमा दमोस्तेयं शौचम् इंन्दियनिग्रह:। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम्।| (मनुस्मृति- 6.92)
1.धृति- सुख दुःख ,हानिलाभ,मानअपमान में धैर्य रखना |
2.क्षमा--निर्बलों पर दया करना व सामर्थ्य होने पर भी दोषी द्वारा पाश्चाताप करने पर दण्ड न देना |
3.दम- मन में अच्छी बातों का चिंतन करना,मन को वश में रखना |
4.अस्तेय- बिना आज्ञा किसी दूसरे की वस्तु का प्रयोग न करना
5.शौच-मन वाणी शरीर व वातावरण को शुद्ध रखना |
6-इन्द्रियनिग्रह- हाथ,पांव,आंख,मुख,नाक आदि को अच्छे कार्यो में लगाना।
7.धी- हर काम बुदधिपूर्वक करना व बुद्धि बढाने हेतू प्राणायाम, सात्विक भोजन,प्रार्थना आदि करना |
8.विद्या-ईश्वर द्वारा बनाये गए प्रत्येक पदार्थ का ज्ञान प्राप्त करना तथा उनसे उपयोग लेना| शुद्ध ज्ञान,शुद्ध कर्म व शुद्ध उपासना को जानना |
9.सत्य- सदैव सत्य व प्रिय बोलना,जो हम जानते हैं उसको वैसा ही अपने द्वारा कहना सत्य कहाता है।
10.अक्रोध-इच्छा विघात से उत्पन्न क्रोध का त्याग करना |
पतंजलि जी के दस यम नियमों में भी लगभग यही बातें कही गईं हैं | धर्म का मूल वेद है, इसलिये धर्म को वैदिक धर्म भी कहा जाता है- वेदोsखिलोधर्ममूलम् | मनु जी द्वारा बताये धर्म के ये दस लक्षण वेदानुकूल हैं | बाहरी चिन्ह मनुष्य को धार्मिक नहीं बनाते अपितु उक्त गुण ही मनुष्य को धार्मिक बनाते हैं। हिन्दू मुस्लिम सिक्ख जैन बौद्ध ईसाई...आदि धर्म नहीं हैं मतमतान्तर हैं जो विघटन का मुख्य कारण हैं,धर्म जोडता है मत तोडता है | तिलक,टीका,भगवा,टोपी, भस्म लगा लेने से कोई धर्मात्मा या धार्मिक नहीं बनता बल्कि धर्म के गुण अपनाने से धार्मिक बनता है। "न लिड्गम् धर्मकारणम्"( मनु) ऋषि दयानन्द के अनुसार जो भी पक्षपात रहित है, न्यायसंगत है, सत्यभाषण सत्याचरण से है, ईश्वर आज्ञा के अनुसार है और जो वेदों के अविरुद्ध है वही धर्म है| आर्य उसी को धर्म जानता और मानता है|
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अधर्म क्या है? परद्रव्येष्वभिध्यानं मनसानिष्टचिन्तनम् ।
वितथाभिनिवेशश्च त्रिविधं कर्म मानसम् ।।
पारुष्यमनृतं चैव पैशुन्यं चापि सर्वशः ।
असम्बद्धप्रलापश्च वाङ्गयं स्याच्चतुर्विधम् ।।
अदत्तानामुपादानं हिंसा चैवाविधानतः ।
परदारोपसेवा च शारीरं त्रिविधं स्मृतम् ।। (मनु० १२/५-७)
(१)हिंसा अर्थात् वैर-बुद्धि का करना।
(२) परद्रव्येष्वभिध्यानम्―छल-कपट और अन्याय से परद्रव्य हरण करने की इच्छा।
(३) मनसानिष्ट-चिन्तनम्―पर का अनिष्ट-चिन्तन=बुरा सोचना, अन्य जीवों को दुःख देकर अपना सुख चाहना।
(४) वितथाभिनिवेशः―मिथ्या निश्चय अर्थात् जो जैसा पदार्थ है, उसको वैसा न जानना किन्तु विपरित ही जानना, जैसा कि विद्या को अविद्या और अविद्या को विद्या जानना। सत्य, अचौर, श्रेष्ठ, साधु―इनको असत्य, चोर, अश्रेष्ठ, असाधु जानना और पाषाण आदि मूर्त्ति और उनके पूजने से देवबुद्धि और मुक्ति का होना, इत्यादि मिथ्या निश्चय से जान लेना।ये तीन मन से अधर्म के लक्षण उत्पन्न होते हैं।
(५) पारुष्यम्―पारुष्य नाम कठोर वचन बोलना, जैसे कि―'आगच्छ काणे' 'आओ काने' इत्यादिक। इसका नाम 'पारुष्य' है।
(६) अनृतम्―असत्य का बोलना। देखे, सुने और ह्रदय के विरुद्ध बोलने का नाम 'अनृत' है।
(७) पैशुन्यम्―चुगली करना।
(८) असम्बद्धप्रलापः―पूर्वापर-विरुद्ध भाषण और प्रतिज्ञा की हानि।
(९) अदत्तानामुपादानम्―बिना आज्ञा के पर-पदार्थ का ग्रहण करना अर्थात् चोरी।
(१०) हिंसा चैवाविधानतः―विधान के बिना हिंसा। अपनी इन्द्रियों की तृप्ति और पुष्टि के लिए मांस का खाना और पशुओं को मारना―यह राक्षस-विधान है। जिन पशुओं से संसार का उपकार होता है उन पशुओं को कभी नहीं मारना चाहिए, क्यों कि इनके मारने से घी, दूध आदि की उत्पत्ति मारी जाती है। इन पशुओं को मारना संविधान से हिंसा है। सिंह, व्याघ्र तथा खेती आदि को हानि पहुँचाने वाले पशुओं की हिंसा विधान विहित है।
(११) परदारोपसेवा―पर-स्त्रीगमन अर्थात् वेश्या वा अन्य किसी की स्त्री के साथ गमन करना और अन्य पुरुषों के साथ स्त्रियों का गमन करना―दोनों को तुल्य पाप है।
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ईश्वर क्या है? यजुर्वेद ४०.८ मंत्र में ईश्वर ने अपने गुण कर्म स्वभाव के विषय में हम मनुष्यों को बताया है -
स पर्यगाच्छुक्रमकायमवर्णमस्नाविरँ शुद्धम् अपापविद्धम्कविर्मनीषी परिभू: स्वयंभूर्याथातथ्यतोअर्थान्व्यदधाच्छाश्वतीभ्य: समाभ्य:|
(-यजुर्वेद ४०.८ )
स- वह परमात्मा
परिअगात- सब ओर गया हुआ, सब ओर व्याप्त व फैला हुआ
शुक्रं- शुद्ध, पवित्र,दीप्त, संसार का उत्पन्न करने वाला
अकायम-सब प्रकार के शरीरों से रहित,निराकार
अव्रनं- घावों व छिद्रों से रहित
अस्नाविरं- नस नाडी के बंधन से रहित,अजन्मा
शुद्धं- सब मलों से रहित, शुद्ध, पवित्र
अपापविद्धं- पापों,अविद्या व विकारों से रहित
कवि: - वेद रूपी काव्य का निर्माता, ज्ञानी, सर्वज्ञ
मनीषी- मनन करने वाला, सबके मन कि बात जानने वाला
परिभू: - सब जगह व्याप्त
स्वयम्भू: - स्वयं सत्ता वाला, अपने कार्य में किसी और की सहायता न लेने वाला,अनादि
याथातथ्यत-यथार्थ भाव से
अर्थान्-वेदज्ञान ,कर्मफल व सब पदार्थों का
शाश्वतीभ्य: समाभ्य:-शाश्वत काल से सब प्रजा के लिए व्यदधात्-विधान करता है,उसी सर्वव्यापक निराकार परमात्मा की योगाभ्यास द्वारा उपासना करो|
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हे परमपिता परमेश्वर! मेरा मन शारीरिक, वाचिक और मानसिक पापों को छोड़कर सदा धर्म के लक्षणों का अनुष्ठान करने वाला हो !
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- डा मुमुक्षु आर्य