महात्मा बुद्ध स्वयं को आर्य मानते थे
महात्मा बुद्ध स्वयं को आर्य मानते थे -
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यह आलेख महात्मा बुद्ध के प्रारम्भिक उपदेशों पर आधारित है। । इसको पढ़कर वे पाठक विस्मय का अनुभव कर सकते हैं जिन्होंने केवल परवर्ती बौद्ध मतानुयायी लेखकों की रचनाओं पर आधारित बौद्ध मत के विवरण को पढ़ा है । महात्मा बुद्ध ने अपने जीवन - काल में स्वयं कुछ नहीं लिखा । उन्होंने उपदेश दिये जिनको शिष्यों ने संकलित किया । बुद्ध के जीवन - काल में उन संकलनों के आधार पर बुद्ध की शिक्षाओं का प्रचार - प्रसार एवं विस्तार होता रहा , किन्तु बुद्ध के निर्वाण के पश्चात् उनकी शिक्षाओं , सिद्धान्तों और नियमों को लेकर उनके अनुयायियों में मतभेद और विवाद उभरने लगे । उनको दूर करने के लिए भारत में समय - समय पर चार बौद्ध शासकों के प्रबन्धन में चार संगोष्ठियाँ आयोजित की गईं । बौद्ध मत के प्रामाणिक आधार ग्रन्थ के रूप में पहले ' विनय पिटक ' और ' सुत्तपिटक ' के स्वरूप का निर्धारण हुआ । कुछ वर्षों के पश्चात् ' अभिधम्म पिटक ' का । इन तीनों को ' त्रिपिटक ' कहा जाता है । जिस प्रकार सनातन जगत् में महाभारत का एक अंश ' भगवद् गीता ' मान्य एवं प्रतिष्ठित है . वही प्रतिष्ठा ' धम्मपद ' की है जो ' सुत्तपिटक ' का एक अंश है । इसमें महात्मा बुद्ध के उपदेशों का संग्रह है । यह प्रारम्भिक उपदेशों का प्रामाणिक संग्रह माना जाता है । प्रस्तुत लेख में मुख्यतः उसी के आधार पर बुद्ध के मन्तव्यों को प्रदर्शित किया है।
महात्मा बुद्ध ने अपने जीवन में कोई नया मत नहीं चलाया था । तत्कालीन रूढ़िवादी पौराणिक समाज में वेद , यज्ञ और धर्म के नाम पर जो विकृतियाँ , कुरीतियाँ , पाखण्ड , अन्धविश्वास , क्रूर और जटिल कर्मकाण्ड एवं जातिवादीय अन्याय पनपे हुए थे उनको मिटाने के लिए उनका सुधार आन्दोलन था । वे एक समाजसुधारक के रूप में कार्यक्षेत्र में प्रस्तुत हुए थे । बाद में , उनके अनुयायियों ने उनकी विचारधारा को एक मत का रूप दे दिया और दर्शन के नाम पर एक नया बौद्ध - दर्शन गढ़ दिया जिसमें अनेक सिद्धान्त बुद्ध के विरुद्ध या बुद्ध द्वारा अप्रस्तुत भी थे और बौद्धों में परस्पर असहमति वाले थे । उनके कारण बौद्ध मत में ही अनेक सम्प्रदाय - उपसम्प्रदाय विकसित हो गये । उनका आचरण भी बुद्ध की शिक्षाओं के विपरीत और विकृत हो गया । उन सम्प्रदायों ने बुद्ध के उद्देश्यों को ही नष्ट - भ्रष्ट कर दिया और बौद्ध मत को नास्तिक मत के रूप ' में स्थापित कर दिया । जैसे महीधर , उव्वट आदि ने अनर्थ करके वेदों के अभिप्राय को बदल दिया , ऐसे ही बौद्ध विद्वानों ने बुद्ध की शिक्षाओं की मनचाही व्याख्या करके उनके अभिप्राय को या तो बदल दिया अथवा उसको संकुचित कर दिया । महात्मा बुद्ध ने स्वयं को आर्य परम्परा के अन्तर्गत माना है और आर्य संस्कृति के उपदेष्टा के रूप में प्रस्तुत किया है । कुछ मतान्तरों को छोड़कर , उन्होंने अपने उपदेशों में वैदिक धर्मशास्त्रों , उपनिषदों और योगदर्शन के सदाचारों का ही प्रस्तुतीकरण किया है । उनके समय में कर्मकाण्ड एवं आहार - विहार में हिंसा का, आचरण में अधर्म का और सामाजिक व्यवहार में जातीय भेदभाव का बोलबाला था अतः उन्होंने अहिंसा , सदाचार और सामाजिक समरसता के निर्माण पर विशेष बल दिया । उपर्युक्त कथनों को अब हम प्रमाणों के आधार पर समझते हैं-
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1.. महात्मा बुद्ध ने स्वयं को आर्य और अपने सामाजिक कार्य को आर्य संस्कृति का पुनरुद्धार कार्य माना था । तपस्या - साधना के पश्चात जिन चार सत्यों का उन्हें बोध हुआ उन्होंने उनको ' आर्य - सत्य ' नाम दिया था । सांसारिक जन्म - मरण रूप बन्धन - दु : ख से मुक्त होने का जो सन्देश आर्यों ने अपने वैदिक शास्त्रों के द्वारा दिया है वही इन चार आर्य - सत्यों में निहित है । इसी आधार पर सर्वदर्शन संग्रह ' के लेखक माधवाचार्य ने ' बौद्धदर्शन ' के प्रकरण में बुद्ध को ' आर्य बुद्ध ' कहा है । इतना ही नहीं , बुद्ध ने दु:खों से छूटने का आठ प्रकार का जो मार्ग बताया है उसको उन्होंने 'आर्य अष्टांग मार्ग ' नाम दिया है । चार 'आर्य सत्य ' हैं दु:ख का ज्ञान होना , दुःख का कारण जानना , दुःख की उत्पत्ति - प्रक्रिया और दुःख को दूर करने की आवश्यकता , दु:ख को दूर करने का मार्ग । उनका 'आर्य अष्टांगिक मार्ग है - सम्यक् दृष्टि ' , सम्यक् संकल्प , सम्यक् वचन , सम्यक् व्यवहार , सम्यक् आजीव , सम्यक् व्यायाम , सम्यक् स्मृति , सम्यक् समाधि । पाठक ध्यान दें कि ये सभी वैदिक शास्त्रों और योगदर्शन के उपदेश हैं । बुद्ध ने उनका सच्चा आचरण करने पर बल दिया है ।
( धम्मपद १४ . १२ )
आर्य मानने के सन्दर्भ में , महात्मा बुद्ध का एक वचन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है जिसमें उन्होंने अपने समस्त अनुयायियों - बौद्धों को आर्य कहा है । वे कहते हैं -
यो सासनं अरहतं अरियानं धम्मजीविनं । पतिक्कोसति दुम्मेधो दिठिं निस्साय पणिकं ।।
( वही , १२ . ८ )
अर्थ - ' जो धर्मनिष्ठ , अर्हत् ( बौद्ध साधक ) आर्यजनों की शिक्षाओं की निन्दा करता है , वह दुर्बुद्धि पापदृष्टि मनुष्य निन्दनीय है ।
आर्य की परिभाषा करते हुए कहा है कि ' प्राणियों की हिंसा करने वाला आर्य नहीं होता । अहिंसक ही सच्चा आर्य होता है ' ( वही , १९ . १५ ) बुद्ध यह नहीं कह रहे कि मैं कोई नया धर्म प्रवर्तित कर रहा हूँ । वे कहते हैं - आर्यों के प्रवर्तित धर्म का पालन करना चाहिए । वही सुखी होता है , वही बुद्धिमान् है ('अरियप्पवेदिते धम्मे सदा रमति पण्डितो '६.४ )। मनुष्य को अप्रमादी होकर आर्यों द्वारा | प्रदत्त ज्ञान ग्रहण करना चाहिए ( २ . २ ) । आर्यों का दर्शन मंगलकारी है और सान्निध्य सुखप्रद है ( 'साधु दस्सनमरियानं सन्निवासो सदा सुखो ' १५ . १० ) । जो व्यक्ति निष्पाप और मलरहित हो जाता है उसको आर्यों की दिव्यभूमि प्राप्त होती है ( १८ . २ ) । ऋषि - महर्षि जन आर्य समुदाय के शास्त्रप्रणेता और समाज - सुधारक थे । बुद्ध कहते हैं कि तन - मन - वचन की पवित्रता रखते हुए ऋषियों के मार्ग पर चलो ( २० . ९ ) । इस प्रकार बुद्ध आर्य - शास्त्रकारों का सम्मान भी करते थे और स्वयं को आर्य समुदाय का सदस्य भी मानते थे ।
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2. महात्मा बुद्ध ने अपने प्रवचन मौखिक रूप में दिये थे । उस प्रवचन काल में बौद्धों के कोई शास्त्र नहीं बने थे । अपने प्रवचनों में वे अनेक बार शास्त्रों की , उनके मार्ग पर चलने की , उनका धर्म ग्रहण करने की प्रेरणा देते हैं । उन शास्त्रों के प्रति सम्मान प्रकट करते हैं । उनसे पहले , शास्त्र के रूप में वैदिक शास्त्र ही प्रसिद्ध एवं प्रतिष्ठित थे । शास्त्रों में सबसे प्रमुख शास्त्र वेद माने जाते थे , अतः शास्त्रों के सम्मान में वेदों का सम्मान स्वतः समाविष्ट हो जाता है । जो लोग कहते हैं कि बुद्ध वेदों के विरोधी थे , यह कथन सर्वथा निराधार है । पं . धर्मदेव विद्यामार्तण्ड ने अपनी पुस्तक ' वेदों का यथार्थ स्वरूप ' में वेदों की प्रशंसा - विषयक बुद्ध के अनेक वचन उद्धृत किये हैं । उनमें एक - दो इस प्रकार हैं -
विद्वा च वेदेहि समेच्च धम्मम् ।
न उच्चावचं गच्छति भूरिपज्जो ।
( सुत्तनिपात , गाथा २९२ )
अर्थ - ' जो विद्वान् वेदसम्मत धर्म को जान लेता है , वह बुद्धिमान् व्यक्ति कभी सन्देहग्रस्त नहीं रहता अर्थात् वह धर्म के यथार्थ स्वरूप को समझ लेता है ।
विद्वा च सो वेदगु नरो इध भवाभावेसंगम इमं विसज्जा !
सो विततन्हो अनिघो निरासो अतारिसो जाति जरान्ति मिति । ( वही , गाथा १०६० )
अर्थ - बुद्ध कहते हैं - ' मैं तुम्हें बताता हूँ कि वेदों का ज्ञाता विद्वान् मनुष्य सांसारिक मोह - माया को त्याग कर तृष्णारहित , पापरहित , इच्छारहित हो जाता है और वह जन्म , जरा , मृत्यु को जीतकर मुक्त हो जाता है । ' एक अन्य स्थल पर तो वेदमन्त्रों का स्वाध्याय न - करने को दोष कहा है।( असज्झायमला मन्ता , ' धम्मपद १८ . ७ ) । बौद्ध ग्रन्थों में श्लोक या गाथाएँ होती हैं , मन्त्र नहीं । होते । अत : यह कथन वेदमन्त्रों के लिए ही है । मनुस्मृति , महाभारत , उपनिषद् आदि शास्त्रों के अनेक उद्धरण बुद्ध . के प्रवचनों में मिलते हैं जिनका पालि भाषा में रूपान्तरण किया हुआ है । इस प्रकार बुद्ध के अनेक प्रवचन वैदिक शास्त्रों पर आधारित हैं ।
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3 . गौतम बुद्ध की विरक्ति का एक कारण यज्ञों के नाम पर क्रूर बलिप्रथा , यज्ञ में पशु - पक्षियों की हिंसा , यज्ञ में की आड़ में मांसाहार जैसा पाप था । यज्ञों में आई विकृतियों के कारण बुद्ध के प्रवचनों में यज्ञ के विधानों के प्रति कोई रुचि नहीं दिखाई देती । किन्तु यह भी वास्तविकता है कि उनके उपदेशों में यज्ञ का कोई विरोध नहीं है , अपितु पुण्य के लिए किये यज्ञ की प्रशंसा है-
यो वेदगु जानरतो सतीमा सम्बोधि पत्तो सरनम बहूनां ।
कालेन तं हि हव्यं पवेच्छे यो ब्राह्मणो पुण्यपेक्षो यजेथ ।
( सुत्तनिपात , गाथा ५०३ )
अर्थ - ' जो वेदों का विद्वान् सत्यचरित्र , ज्ञानवान् , अधिक से अधिक लोगों को शरण देने वाला हो । ऐसा ब्राह्मण यदि पुण्य के लिए यज्ञानुष्ठान करे तो उसका उस समय हव्य - कव्य से सम्मान करे । ' _ हाँ , यह अवश्य है कि जैसे धर्मशास्त्रों में बाह्य क्रियाओं की अपेक्षया आन्तरिक ध्यान आदि को तुलनात्मक रूप से उत्तम माना है , उसी प्रकार बुद्ध ने यज्ञ आदि की अपेक्षा निर्मल मन - आचरण को उत्तम माना है । उसका मूल कारण उनके मन पर तत्कालीन विकृत यज्ञों का प्रभाव है ।
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4 . समीक्षकों का एक वर्ग बौद्ध मत को अनीश्वरवादी और अनात्मवादी मानता है । एक वर्ग ऐसा नहीं मानता । इस वर्ग का मानना है कि गौतम बुद्ध ने आचरण की शुद्धता को मुख्य उद्देश्य बनाया था , अतः ईश्वर , आत्मा और सृष्टि जैसे जटिल विषयों को अपना विवेच्य विषय नहीं बनाया । इन विषयों पर वे मौन रहे , विरोधी नहीं थे । विरोध का विवाद परवर्ती अनुयायी विद्वानों ने खड़ा किया है । उत्तर काल में आकर कई बौद्ध सम्प्रदाय स्वयं भी ईश्वरवादी बन गये और बुद्ध को ही ईश्वर मानकर पूजा करने लगे । बुद्ध के उपदेशों में कई स्थल ऐसे मिलते हैं जहाँ वे ईश्वर और जीवात्मा की सत्ता को स्वीकार करते हुए दिखाई पड़ते हैं । इसकी पुष्टि में दो गाथाओं के चरणों को प्रस्तुत किया जा सकता है -
"गहकारं गवेसन्तो दुक्खा जाति पुनप्पुनं ।"
गहकारक दिट्ठोसि पुन गेहं न काहसि । "
( धम्मपद ११ . ८ , ९ )
अर्थात् - ' हे मेरे शरीर रूपी घर के स्रष्टा ! तुम्हारी खोज की चाहत में मैंने दुःख-पूर्ण जन्म पुनः - पुनः लिया है । हे मेरे शरीर रूपी घर को बनाने वाले ! अब मैंने तुम्हारा साक्षात् कर लिया है , अब मैं इस शरीर को धारण नहीं करूंगा । ' भाव बड़ा स्पष्ट है । शरीर का स्रष्टा ईश्वर होता है । और उसके दर्शन से जन्म - मरण रूप दुःख से द्रष्टा मुक्त हो जाता है । इसी प्रकार बुद्ध के उपदेशों में आत्मा , प्रज्ञा , मन , चित्त का पृथक् और स्पष्ट उल्लेख है । वैदिक शास्त्रों में आये _
"आत्मैव ह्यात्मनः साक्षी गतिरात्मा तथात्मनः
" ( मनु . ८ . ८४ ) " उद्धरेदात्मनात्मानम् " आदि वाक्यों की आत्मा परमात्मा - परक सही व्याख्या की हुई मिलती है , किन्तु बौद्ध साहित्य में इनके पालि में रूपान्तरित पद्यों "अत्ता हि आत्मनो नाथो अत्ता हि आत्मनो गतिः "( २५ . २१ ) , " अत्तना चोदयेदत्तानम् " ( २५ . २० ) की उपव्याख्या की जाती है । बौद्ध मत को अनीश्वरवादी अनात्मवादी दिखाने के लिए ' आत्मा ' शब्द की ' अपना ' यह गलत व्याख्या की जाती है , ' आत्मा ' को लुप्त कर दिया जाता है । बहुत समय तक आर्य , पौराणिक हिन्दू और बौद्ध साथ - साथ रहे । बुद्ध के सुधारों से पौराणिकों की आजीविका , इन्द्रियलिप्सा , विलासिता , वर्चस्व पर दुष्प्रभाव पड़ने लगा , दलितों - पिछड़ों , स्त्रियों की समानता , शिक्षा आदि से पौराणिक आहत हुए । दूसरी ओर बौद्ध स्वयं को आर्य समुदाय से पृथक् स्वतन्त्र समुदाय बनने के उपाय कर रहे थे । दोनों वर्गों के मध्य हुए वैचारिक , दार्शनिक , सामाजिक , आहंकारिक संघर्षों ने दो बड़े समुदायों को विघटित कर दिया । आर्य समुदाय में बने रहते तो इसकी विखण्डन की क्षति नहीं होती । एक समुदाय होता , एक संगठनात्मक . शक्ति होती , एक समुदाय के सहभागी अनेक राष्ट्र होते , किन्तु अदूरदर्शिता और संकुचित विचारों के कारण ऐसा न हो सका । इसके हानिकारक परिणामों को भविष्य में दोनों समुदायों को भुगतना पड़ेगा । उससे बचने के लिए आज भी फिर से एक समुदाय बनकर संगठित रह सकते हैं । आज जब घोर नास्तिक कम्युनिस्ट , आर्य , सनातनी आदि एक हिन्दू समुदाय में सहभाव से रह सकते हैं तो बौद्ध , जैन आदि समुदायों के रहने में तो कोई आपत्ति ही नहीं है ।
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साभार : डॉ . सुरेन्द्र कुमार