मूर्ति पूजा वेद विरुद्ध होने से पाप है
मूर्तिपूजा वाममार्गियों की देन है, भारत के पतन व पराधीनता का मुख्य कारण है, वेदविरुद्ध होने से पाप है -
वेदविरुद्ध आचरण करने वालों को वाममार्गी कहा जाता है । इन्हीं धूर्तों ने तन्त्र ग्रन्थों में मद्य मांस मीन मुद्रा मैथुन को मुक्ति का साधन बताया है, इन्हीं मूर्खों ने पाषाणपूजा व यज्ञों में पशुबलि का विधान किया था, इन्हीं लोगों ने पुराण आदि अनार्ष ग्रन्थ वेदव्यास के नाम से लिखे हैं, इन्हीं लोगों ने वेद मंत्रों के अर्थ का अनर्थ कर उनमें पत्थरो की पूजा व अवतारवाद की मिथ्या धारणाएं समाज में प्रचलित की हैं, यही लोग भारत के पतन व पराधीनता का कारण हैं, इन्हीं मूर्ख लोगों ने सगुण का अर्थ साकार व निर्गुण का अर्थ निराकार किया है ।
इन्हीं लोगों के कारण आज ज्यादातर लोग निराकार साकार और निर्गुण सगुण को एक ही समझने लगे हैं । इसका मुख्य कारण स्वार्थ व व्याकरण की सही जानकारी न होना है। सगुण यानि गुण सहित जैसे दयालु , न्यायकारी,परोपकारी,
स्वयंभू,सच्चिदानंद आदि ईश्वर के गुण होने से वह ईश्वर सगुण है । इसी प्रकार अजर, अमर, अविनाशी, अकायम्,अव्रणम् आदि होने से वह निर्गुण है । आकार रहित होने से निराकार है । ब्रह्मा से लेकर जैमिनी तक सभी ऋषि मुनियों ने निराकार ईश्वर की ही उपासना की है । महीधर और सायणाचार्य के भाष्य रूढ़िवादी भाष्य हैं । महर्षि दयानन्द ने यौगिक भाष्य को प्रमाण माना है । प्रतिमा का अर्थ होता है- तुलना, प्रतिनिधि, परिमाण, प्रतिकृति आदि । प्रतिमा का अर्थ किसी भी व्याकरण शास्त्र में मूर्ति नहीं ।
चारों वेदों में एक भी मंत्र ऐसा नही है जिसमें मूर्ति पूजा हो । सबसे बड़ी बात तो ये है कि वेद में मूर्ति शब्द ही नहीं है फिर मूर्ति पूजा का मतलब ही नहीं ।
केनोपनिषद में स्पष्ट लिखा है कि जो आँख से दिखाई दे, जो कानों से सुनाई दे, जिसे नाक सूंघे वह ईश्वर नहीं है अर्थात वह निराकार है
ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशे अर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन सर्वभूतानि यन्त्ररूढ़ानि मायया - गीता
हे अर्जुन ! ईश्वर तो प्राणियों के भीतर सदा से विराजमान है मगर अज्ञान के कारण भ्रमित होकर यंत्रवत भ्रमित लोग पत्थरों को पूज रहे हैं अर्थात गीता में भी मूर्ति पूजा का विधान नही है ।
यजुर्वेद 40/17 में कहा है "ओ३म् खं ब्रह्म" अर्थात् ओ३म् परमात्मा को आकाश के तुल्य व्यापक बताया है |
यजुर्वेद 40.08 में कहा है- स परिअगात शुक्रं अकायम् अवर्णं अस्नाविरम्...अर्थात वह परमात्मा सब दिशाओं में फैला हुआ है, काया रहित है, रंग रुप रहित है और नस नाडियों के बन्धन में न आने वाला है ।
न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यश:|हिरण्यगर्भ:इत्येष मा मा हिंँसीद् इत्येषा यस्मान्नजात इत्येष:|| (यजु०३२/३)
पदार्थ- हे मनुष्यो! यस्य =जिसका महत्=महान,पूज्य,बड़ा यश:=कीर्ति करने वाला धर्म युक्त आचरण ही नाम स्मरण है जो हिरण्यगर्भ:=सूर्य,बिजली आदि पदार्थों का आधार इति = इस प्रकार एष:=अंतर्यामी होने से प्रत्यक्ष जिसकी मा= मुझको मा,हिंसीत=मत ताड़ना दे या वह मुझे अपने से विमुख न करे ।
इति=इस प्रकार एषा=यह प्रार्थना वा बुद्धि और यस्मात= जिस कारण न:=नहीं जात:=उत्पन्न हुआ इति=इस प्रकार एष:=यह परमात्मा उपासना के योग्य है तस्य=उस परमेश्वर की प्रतिमा=परिमाण अर्थात् उसके तुल्य,अवधि का साधन प्रतिकृति,मूर्ति वा आकृति न अस्ति=नहीं है,नहीं है ।
संवत्सरस्य प्रतिमा यां त्वां रात्र्युपास्महे| सा न आयुषमतींप्रजां रायस्यपोषेण सं सृज||
अथर्ववेद ३/१०/३
इसका अर्थ है- अत्यंत परमेश्वर व प्रकृति के सूक्ष्म और स्थूल रूप के ज्ञान से उपकार लेकर हम अपनी संतान के सहित धनी,स्वस्थ्य और चिरंजीवी बनें । यहां भी प्रतिमा का अर्थ प्रतिनिधि किया है जिसके उपमालंकार का वर्णन है|
एह्यश्मानमा तिष्ठाश्मा भवतु ते तनु:| कृण्वन्तु विश्वे देवा आयुष्टे शरद:शतम्||अथर्व०३/१३/४
इस मंत्र में ब्रह्मचारी को पत्थर की तरह कठोर शरीर बनाने की शिक्षा है न कि मूर्ति पूजा की । पदार्थ-
हे ब्रह्मचारीएहि=आ+इहि=तू आ,अश्मानम्=इस शिला पर,आ+तिष्ठ=चढ़,ते=तेरा,तनू=शरीर,अस्मा=शिला जैंसा दृढ़,अस्तु=होवे |विश्वे=सब,देवा=उत्तम गुण वाले पुरूष और पदार्थ, ते=तेरी,आयु=आयु को,शतम्=सौ,शरद:=मौसमों तक कृण्वन्तु=दीर्घ करें ।
वेद में एक भी मंत्र ऐसा नहीं है जिसमें मूर्ति पूजा का विधान हो,जब पुजारी आपको बहकाता है कि मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा हो गई तब आपको कहना चाहिए कि माता पिता में तो खुद ईश्वर ने प्राण प्रतिष्ठा की है उनकी पूजा ही करना श्रेष्ठ है । सभी प्राणियों में प्राण प्रतिष्ठा ईश्वर करता है फिर मूर्ति में ईश्वर प्राण प्रतिष्ठा क्यों नही करता ? ईश्वर जिसमें प्राण डालता है वह चलता है, दौड़ता है, खाता पीता बोलता है,जन्मता है, मरता है क्या आज तक किसी मूर्ति पूजक ने मूर्ति को जन्मते व मरते देखा है ?
ईश्वरीय वाणी वेद के अनुसार सर्वव्यापक ईश्वर ने संसार बनाया मगर शिवपुराण कहता है शिव ने, विष्णु पुराण कहता है विष्णु ने, देवी भागवत वाले कहते हैं दुर्गा मां ने संसार बनाया! जब भारत विश्व गुरू था यहां न कोई मूर्ति थी न ही मूर्ति पूजा । ब्रह्मा,विष्णु , शिव, गणेश महेश कोई ईश्वर नहीं थे । ईश्वर तो सगुण-निर्गुण,निराकार है|उसी निराकार ईश्वर के अनेक गुणवाची नाम हैं ,ईश्वर का मुख्य व निज नाम केवल ओ३म् है । उसी के जप व ध्यान का विधान सब वेदादि शास्त्रों ने किया है ।
ईश्वर सच्चिदानंदस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता,सृष्टिधर्ता, सृष्टिहर्ता व मोक्ष दाता है । ईश्वर के इन गुणों का चिन्तन ही उस परमात्मा की उपासना है पूजा है भक्ति है ।
पशुबलि, पाषाणपूजा, शिवलिंग पूजा, गणेशपूजा, दुर्गा पूजा आदि अवैदिक परम्परायें वाममार्गियों की देन हैं । ऋषि दयानंद जी ने सत्यार्थप्रकाश में मूर्ति पूजा को वेदविरुद्ध होने से पाप बताया है, भारत के पतन व पराधीनता का मुख्य कारण बताया है ।
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-डा मुमक्षु आर्य