राम मन्दिर और आर्यसमाज
*राम मंदिर और आर्यसमाज-*
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ऋग्वेद के प्रथम मंत्र 'अग्निम् इडे पुरोहितं यज्ञस्य देवम् ऋत्विजम्। होतारमं रत्नधातमम्।।' में ईश्वर ने सब मनुष्यों को उपदेश किया है कि उसने ही सब लोक लोकान्तरों को,सब ऋतुओं को,सब पदार्थों को,सब रत्नों को और सब ज्ञान विज्ञान को प्रगट किया है। वह अग्नि की तरह सूक्ष्म और सब पदार्थों में समाया हुआ है। वह ही सृष्टि रुपी यज्ञ का पुरोहित है। सब मनुष्य उसी की स्तुति करते हुये उसकी आज्ञा पालन में रहें।हिन्दू मुस्लिम सिख जैन बौद्ध ईसाई, मन्दिर मस्जिद चर्च गुरुद्वारे, पशुबलि, पाषाणपूजा, मांसभक्षण बलि प्रथा आदि का वेदों में नामोनिशान नहीं। ये सब वेद की आज्ञाओं के विरुद्ध परम्पराऐ हैं।
मन्दिरों के नाम पर क्या होता है ? झूठ, छल, कपट, पाखंड, मूर्तियों को नहलाया धुलाना, रंग बिरंगे वस्त्र पहनाना, मूर्तियों में प्राण-प्रतिष्ठा का ढोंग आदि । विश्वविद्यालय लाखों लोगों को शिक्षित बनाएगा, नौकरी देगा और उसमें वेदादि शास्त्रों, रामयण, महाभारत पर शोध होगा । पाखंड को सभ्यता व संस्कृति का नाम देना उचित नहीं । ऋषि दयानंद सरस्वती जी ने भी मन्दिरों के निर्माण व मूर्तियों की पूजा का सख्त विरोध किया था। कबीर, नानक व लाखों ऋषि मुनियों ने भी मूर्तियों की पूजा अर्चना को ग़लत कहा है। वेदादि शास्त्रों में भी इसकी निन्दा की गई है। अयोध्या में अनेक मन्दिर हैं, हर मन्दिर का महंत दावा करता है कि राम वहां पैदा हुए थे। पुजारियों ने मन्दिरों में राम-सीता की भद्दी सी मूर्त्तियां स्थापित कर रखी हैं। रामलल्ला की मूर्त्ति भी कुछ ऐसी ही है। हर पुजारी पूरा दिन अपने ग्राहकों की बाट जोहता रहता है। वहां के पण्डे पुजारियों व कथित साधु-संतों को वेदादि शास्त्रों का कुछ ज्ञान नहीं, शुद्ध गायत्री मंत्र तक बोल नहीं सकते, केवल राम राम ही करना आता है।
राम ब्रह्म नहीं, अपने समय के महापुरुष थे, जो उस ब्रह्म की आराधना करते थे जो सर्वव्यापक है। राम महाराज दशरथ के पुत्र थे। सर्वव्यापक तो एक ईश्वर ही होता है, राम तो एकदेशीय थे। अनन्त तो केवल ईश्वर है, राम खुद उस असीम, अनन्त ब्रह्म के उपासक थे। आत्मा सबका अनादि है,अत: राम का भी अनादि है किन्तु शरीर-धारी राम अनादि नहीं हो सकते। कण कण में रम रहें राम को घर की जरूरत नहीं, दशरथनन्दन राम को घर की जरूरत नहीं, जिसे तुम रामलल्ला कहते हो वह राम नहीं, फिर यह घर, यह मंदिर किसके लिए बना रहे हो ? अपने स्वार्थ के लिए ? अपने अहम् की पूर्ति के लिए ? या फिर अपनी राजनीति के लिए ? कण कण में रमें राम के ओम् नाम का स्मरण करो, वेद में वर्णित उसकी आज्ञाओं का पालन करो, दशरथनन्दन राम की तरह मां बाप की सेवा करो, नित्य यज्ञ करो, ध्यान करो....यही राम की सच्ची पूजा है। दशरथनन्दन रामजन्म भूमि का सदुपयोग इसी में है कि वहां एक विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालय का निर्माण हो। विश्वविद्यालय के अन्तर्गत ही वैदिक गुरुकुल, भव्य गौशाला, भव्य यज्ञशाला व राम के जीवन को दर्शाती भव्य चित्रदीर्घा हो। यज्ञशाला में प्रात: सायं वेद मंत्रों से यज्ञ हो।
वर्तमान हिन्दु समाज में अन्धविश्वास पाखण्ड बढ़ता ही जा रहा है। आज थोडा सा भी कटाक्ष किसी के पाखण्ड पर कोई करे तो 'जय श्रीराम' का नारा लगा कर उसे गद्दार कहा जाता हैं, गालियां दी जाती हैं, मारने की धमकियां दी जाती हैं ! क्या ये लोग मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के भक्त कहलाने योग्य है ? आज धर्म के नाम पर न जाने क्या क्या पाखंड लीला हो रही है। नेता भी वोट बैंक की राजनीति के चलते सच कहने से डरते हैं।
RAM means “Ishwar” that exists in every sub atomic particle of this universe which is about ninty three billion light years in diameter. That is real “RAM” or God. PK says, “ tum chote se gola ka aadmi humara ghar banane chala hai.” No one can build temple of Ram. तुम छोटे से गोले का आदमी हमारा घर बनाने चला है !! असली राम इस विशाल सृष्टि के अंदर बाहर सर्वत्र विद्यमान है, वह सृष्टि के कण कण में रमा हुआ है, उसका मंदिर कोई नहीं बना सकता । महर्षि दयानन्द के शब्दों में- मूर्तिपूजा अधर्म है, पाप है, गहरी खाई है, भारत के पतन और पराधीनता का मुख्य कारण है, मूर्ति-पूजा वैसे है जैसे एक चक्रवर्ती राजा को पूरे राज्य का स्वामी न मानकर एक छोटी सी झोपड़ी का स्वामी मानना ।
हिन्दू धर्म = शिवलिंगपूजा, गणेशपूजा, महाकालपूजा, ग्रहपूजा, रथयात्रा, कावंडयात्रा, अमरनाथयात्रा, केदारनाथयात्रा, मन्दिरों में जानवरों की बलि, देवी देवताओं की मूर्तियों की पूजा अर्चना, मूर्तियों में प्राण-प्रतिष्ठा का ढोंग और तन्त्र पुराण आदि की काल्पनिक बातें । वैदिक धर्म= वेदानुकूल आचरण, त्रैतवाद, पंचमहायज्ञ, सौलह संस्कार, वर्णाश्रमव्यवस्था और वेद उपनिषद् दर्शन आदि की वैज्ञानिक बातें।
आज से लगभग 155 वर्ष पूर्व चैत्र शुक्ला 5 शनिवार सम्वत् 1932 विक्रमी, तदनुसार 10 अप्रैल 1875 को मुम्बई में महर्षि दयानंद जी द्वारा आर्यसमाज की स्थापना की गई थी। उदेश्यय था- सत्य सनातन वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना, हर प्रकार के अन्धविश्वास पाखंड का निर्भय होकर खण्डन करना और ईश्वरीय वाणी वेद का प्रचार प्रसार करना ।
सोशल मीडिया पर संघ और भाजपा से जुड़े कुछ लोग आर्य समाज की खाल ओढ कर महर्षि दयानंद के विचारों की खुले आम हत्या कर रहे हैं। हैदराबाद सत्याग्रह की मिसाल पेश कर रहे हैं। हैदराबाद सत्याग्रह निजाम के अत्याचारों के विरुद्ध आंदोलन था जिसमें आर्यसमाज ने मन्दिरों पर हमलों का विरोध किया था,फलस्वरूप निजाम ने आर्यसमाज पर भीअत्याचार करने शुरू कर दिए । उस समय हिन्दू महासभा और संघ के लोग निजाम के अत्याचारों के विरुद्ध खुल कर सामने नहीं आये । आर्य समाज ने निजाम के विरुद्ध लड़ाई लडी और विजय हासिल की। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि आर्यसमाज मन्दिरों व मूर्तियों की पूजा का समर्थक हो गया। आर्य समाज मंदिर मस्जिद तोड़ने के पक्ष में नहीं, उनके सदुपयोग के पक्ष में है।
राम मंदिर तो बना लोगे लेकिन उसे सुरक्षित कब तक रख पाओगे ? तुम्हारी वर्तमान जन्म दर 1.7% है ,उनकी 7.8% चल रही है, तुम्हारा 35 साल का युवा 2 बच्चों का बाप है, उनका 35 साल का युवा 4-8 बच्चों का बाप और 8- 16 पोते-पोतीयों का दादा बन जाता है । तुम्हारी 26 साल की लड़की अभी शादी नहीं करना चाहती या 18 साल की उम्र में घर से भाग जाती है उनकी 18-20 साल की लड़की 4 बच्चों की माँ बन जाती है। जनसंख्या नियंत्रण कानून बना भी लो, तो भी यह सिलसिला रुक नहीं सकता। मन्दिर टुटते आए हैं, टुटते रहेंगे, दो सौ साल बाद फिर टुट सकते हैं। मूर्तियों की पूजा के लिए मन्दिरों का निर्माण हमारी संस्कृति नहीं है। गांव गांव में गुरुकुल व यज्ञशालाओं का निर्माण हमारी संस्कृति है, हमारी अस्मिता है ।
मन्दिर का निर्माण मूर्तियों की पूजा के लिए किया जाता है और मूर्तियों की पूजा पाप है। जो लोग मूर्तियों की पूजा के लिए मन्दिर निर्माण के समर्थक हैं ,वे पापी क्यों नहीं ? पाप का समर्थन करने वाले भी पापी ही होते हैं। ऋषि दयानंद सत्यार्थप्रकाश में लिखते हैं- "कर्म दो प्रकार के होते हैं—एक विहित-जो कर्त्तव्यता से वेद में सत्यभाषणादि प्रतिपादित हैं। दूसरे निषिद्ध- जो अकर्त्तव्यता से मिथ्याभाषणादि वेद में निषिद्ध हैं। जैसे विहित का अनुष्ठान करना वह धर्म, उस का न करना अधर्म है। वैसे ही निषिद्ध कर्म का करना अधर्म और न करना धर्म है। जब वेदों से निषिद्ध मूर्त्तिपूजादि कर्मों को तुम करते हो तो पापी क्यों नहीं ?"
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- डा मुमुक्षु आर्य