बच्चों को स्मरण करवाने योग्य वाक्य
*बच्चों को स्मरण करवाने योग्य वाक्य-*
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*(क) ईश्वर के गुण-* सच्चिदानंदस्वरुप, निराकार' सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु अजन्मा, अनन्त ।ईश्वर का मुख्य नाम ओ३म् है। नोटः- बडे बच्चों को कुछ अन्य गुणवाचक नाम भी स्मरण करवाये जा सकते हैं- ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र, सृष्टि-कर्ता, सृष्टिहर्ता, मोक्षदाता, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गणेश, महादेव, विराट, अग्नि, विश्व, हिरण्यगर्भ, वायु, तैजस, ईश्वर, आदित्य, प्राज्ञ,अग्नि, इन्द्र, वरुण,प्रजापति, मनु, प्राण, रूद्र, कालाग्नि, दिव्य, सुपर्ण, गुरुत्मान्, मातरिश्वा, भूमि आदि।
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*(ख) ईश्वर के कार्य-* १. ईश्वर सृष्टि की रचना करते हैं। २. ईश्वर सृष्टि का पालन करते हैं। ३. ईश्वर सृष्टि का संहार करते हैं। ४. ईश्वर वेदों का ज्ञान देते हैं। ५. ईश्वर अच्छे-बुरे कर्मों का फल देते हैं। ६. ईश्वर योगियों को मोक्ष प्रदान करते हैं।
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*(ग) ईश्वर के उपदेश-* १. वेद पढो। २. सन्ध्या करो, हवन करो। ३. चित्र नहीं चरित्र की पूजा करो। ४. सदा सच बोलो, मीठा बोलो। ५. झूठ बोलना पाप है। ६ . मांस अंडा खाना पाप है। ७. पशुबलि पाषाण पूजा पाप है।
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*(घ) ईश्वर से हमारा सम्बन्ध*- १. ईश्वर हमारी माता है हम उसके पुत्र हैं। २. ईश्वर हमारा पिता है हम उसके पुत्र हैं। ३. ईश्वर हमारा गुरू है हम उसके शिष्य हैं। ४. ईश्वर हमारा राजा है हम उसकी प्रजा हैं। ५. ईश्वर उपास्य है हम उसके उपासक हैं। ६. ईश्वर व्यापक है हम व्याप्य हैं।
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*(ङ) ईश्वर से प्रार्थना-* १. हे ईश्वर ! हमें सद्बुद्धि दो। २. हे ईश्वर ! हमारे सब दुःख दुर्गुण दूर कर दो। ३. हे ईश्वर ! हमें सब बन्धनों से मुक्त कर दो। ४. हे ईश्वर ! सब सुखी हों, सबका मंगल हो। ५. हे ईश्वर ! सब ओर शान्ति ही शान्ति हो। ६. ओ३म् असतो मा सदगमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय , मृत्योर्मा अमृतंगमय ।
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*(च) साधारण ज्ञान-* १.अनादि वस्तुएं - ईश्वर, जीव और प्रकृति (God, Soul and Matter) २. सृष्टि काल- चार अरब बतीस करोड़ वर्ष। ३. प्रलय काल- चार अरब बत्तीस करोड़ वर्ष। ४. मोक्ष काल- 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्ष। ५. हमारे देश का मूल नाम- आर्यावर्त। ६. अनादि का अर्थ- नित्य,शाश्वत ( eternal)। ७. वेद संस्कृत में ही क्यों- क्योंकि संस्कृत को सीखने के लिये सबको एक जैसी मेहनत करनी पडती है और यह सबसे समृद्ध व वैज्ञानिक दैवी भाषा है।
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*धर्म के लक्षण*- धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।।(मनुस्मृति 6.92) अर्थ - धृति (धैर्य), क्षमा (बुरा करने वाले का भी उपकार करना), दम (हमेशा संयम से धर्मं में लगे रहना), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (भीतर और बाहर की पवित्रता), इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रियों को हमेशा धर्माचरण में लगाना), धी (सत्कर्मो से बुद्धि को बढ़ाना), विद्या (यथार्थ ज्ञान लेना). सत्यम (हमेशा सत्य का आचरण करना) और अक्रोध (क्रोध को छोड़कर हमेशा शांत रहना।
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तुम्हारी ज्योति से रोशन हैं सूरज चांद और तारे।
महा अन्धेर है, तुमको अगर दीपक दीखाऊं मैं।।
बडे नादान हैं, वे जन, जो गढते आपकी मूरत।
बनाता हैं जो सब जग को,उसे कैसे बनाऊं मैं।।
न भुजायें हैं, न गर्दन हैं, न सीना है, न पेशानी।
तू हैं निर्लेप नारायण, कहां चन्दन लगाऊं मैं।।
लगाना भोग तुमको,यह एक अपमान करना है।
खिलाता हैं जो सब जग को उसे कैसे खिलाऊं मैं।।
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*गायत्री मंत्र*- ओ३म् भूर्भुवः स्वः, तत्सवितुर्वरेण्यं, भर्गो देवस्य धीमहि, धियो यो नः प्रचोदयात्।-यजुर्वेद 36.3 कविता के रुप में भावार्थः-
तूने हमें उत्पन्न किया, पालन कर रहा है तू।
तुझ से ही पाते प्राण हम, दुखियों के कष्ट हरता है तू।।
तेरा महान् तेज है, छाया हुआ सभी स्थान।
सृष्टि की वस्तु वस्तु में, तू हो रहा है विद्यमान।।
तेरा ही धरते ध्यान हम, मांगते तेरी दया।
ईश्वर हमारी बुद्धि को,श्रेष्ठ मार्ग पर चला।।
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*माता पिता और गुरू जन अपने बच्चों को उपरोक्त वाक्य स्मरण करवाएं, बहुत अच्छे संस्कार पडेंगे।*
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*- डा मुमुक्षु आर्य, हृदय रोग विशेषज्ञ,वेद संस्थान, नोएडा, गौतम बुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश, भारत।*